Vaayu Pradushan avam Prabandhan
वायु प्रदूषण एवं प्रबन्धन
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Vaayu Pradushan avam Prabandhan भारतीय परिप्रेक्ष्य में बढ़ते वायु प्रदूषण और उसके प्रभावों पर केंद्रित यह पुस्तक, डॉ. डी. के. ठाकुर द्वारा प्रस्तुत की गई है। यह मनुष्य के जीवन में शुद्ध वायु की आवश्यकता को रेखांकित करती है, साथ ही वायु प्रदूषण के कारणों, निवारणों और प्रबंधन को विस्तार से समझाती है, जिसमें पंच महायज्ञों के महत्व पर भी प्रकाश डाला गया है।
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भारतीय परिपेक्ष्य में बढ़ता प्रदूषण-घुटता दम।’ पर्यावरण प्रदूषण की वर्तमान स्थिति से रू-ब-रूः मात्र ज्योतिष की भविष्यवाणी अथवा दूरदर्शन पर दर्शाये जाने वाले किसी बाल-सुलभ धारावाहिक की परिकल्पना नहीं कि जा सकती है कि आगामी पचास वर्षों के बाद यह दुनिया उजड़ जाएगी। जिस रफ्तार से दुनिया के लोग प्राकृतिक संसाधनों की लूट तथा उन्हें विकृत करने में लगे हैं, उस हिसाब से आने वाले वर्षों के पश्चात् वर्तमान पृथ्वी जैसे दो और मानव प्रयोग योग्य ग्रहों की आवश्यकता पड़ेगी।
मनुष्य जीवन के प्रत्येक पहलू को अपने में समाविष्ट करने वाली उस व्यवस्था का एक भाग है- पंच महायज्ञों की अनिवार्यता। ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ, पितृयज्ञ, अतिथि यज्ञ तथा बलिवैश्वदेव यज्ञ इन पाँच महायज्ञों को प्रतिदिन करने का विधान किया गया है तथा इन्हें यथाशक्ति कभी भी न छोड़ने का निर्देश है। इन पाँच महायज्ञों को करते रहने पर ही मनुष्य समाज की सुखपूर्ण स्थिति निर्भर है। किन्तु आज हम अपने अज्ञान और आलस्य के कारण ऋषियों की इस कल्याणकारी व्यवस्था को छोड़ बैठे हैं। आर्य समाज की विचारधारा से अनुप्राणित कुछ बुद्धिशील लोग इन यंज्ञों के महत्त्व को समझते हैं, किन्तु कई कारणों से इनमें भी अधिकांश लोग इन सभी यंज्ञों को नियमपूर्वक नहीं कर पाते।
मनुष्य को भोजन एवं जल से भी अधिक शुद्ध वायु की आवश्यकता होती है। बिना साँस लिये मनुष्य कुछ मिनटों से अधिक जीवित नहीं रह सकता। एक सामान्य मनुष्य प्रतिदिन औसतन 16 किलो वायु ग्रहण करता है। वायु की यह मात्रा उसके द्वारा गहण किये गये भोजन आदि पदार्थों का 80 प्रतिशत है।
प्रस्तुत पुस्तक में वायु प्रदूषण के कारणों व निर्वारणों तथा प्रबन्धन को विस्तार से बताया गया है।
| Weight | 390 g |
|---|---|
| Dimensions | 22.5 × 14.5 × 2 cm |






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