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Utari Bharat Ka Itihas (650-1200 E.)

उत्तरी भारत का इतिहास (650-1200 ई.)

Author(s): Shivkumar Gupt
Language: Hindi
Format: Hardcover
Pages: 352
Edition: Reprint, 2009
Published Year: 1999
ISBN: 81-7056-193-0

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सातवीं शताब्दी में वर्द्धन साम्राज्य के पतन के पश्चात् से लगभग ग्यारहवीं शताब्दी के प्रारम्भ तक उत्तर भारत में गुर्जर प्रतीहार, चाहमान, चालुक्य, चन्देल, परमार, गहड़वाल, पाल, सेन तथा गंग जैसे अनेक राजवंशों का उदय हुआ जिन्होंने अपनी शक्ति को बढ़ाकर सम्पूर्ण उत्तरी भारत पर अधिकार करने का प्रयत्न किया। इस प्रयत्न में गुर्जर, प्रतीहार और पाल वंश के कुछ शासक कुछ समय के लिए सफल भी हुए अन्यथा वे आपस में ही निरन्तर संघर्षशील बने रहे। इन राजवंशों के समक्ष सबसे बड़ा प्रश्न उनकी प्रतिष्ठा का था। न्यूनाधिक रूप में सभी अपने को राजपूत क्षत्रिय सिद्ध करने के लिए अपने कुल को चन्द्र, सूर्य या अग्नि की दैवी आभा से मण्डित कर प्रतिष्ठा अर्जित करने का प्रयत्न करते हैं। इस समय को ऐतिहासिक चेतना का मूल लक्षण कृत्रिम मूल्यों और झूठी प्रतिष्ठा में आस्था है। इस समय सम्पूर्ण उत्तरी भारत में इन वंशों के द्वारा एक ऐसे सैनिक आभिजात्य वर्ग का निर्माण होता है जो वंशाभिमान, स्थानीय गौरव और संकुचित जातीय भावना से परिपूर्ण सतत् भाट और चारणों से घिरा रहता है। इनके द्वारा स्थापित संस्थाएँ और आदर्श खोखले और प्रभावहीन दिखाई देते हैं। सर्वोपरि न होते हुए भी सर्वोच्च समझने की भावना, पारस्परिक ईर्ष्या और निरर्थक वैमनस्य के कारण ये वंश कभी भी राजनैतिक दृष्टि से संगठित नहीं हो पाये। इनके बीच उस प्रकार राष्ट्रीय दृष्टिकोण नहीं पनप सका ‘जो विदेशी आक्रमणकारियों के विरुद्ध गुप्तकालीन संघर्ष की विक्रमादित्य परम्परा में था।
राजनीतिक दृष्टि से असफल होने पर भी इनके आन- बान और गौरव प्रदर्शन के आग्रह ने साहित्य और कला के क्षेत्र क्रा अत्यधिक विस्तार किया। सभी शासकों ने अपने को श्रेष्ठ और कला-पारखी सिद्ध करने के प्रयास में कवियों और लेखकों को सम्मानित कर आश्रय प्रदान किया। जितने चरित- काव्य इस युग में लिखे गये उतने किसी भी अन्य युग में दुर्लभ हैं। कुछ शासक स्वयं भी प्रतिभावान कवि और लेखक थे। इनमें धारा के राजा भोज, कलचुरी के मयूरराज तथा अजमेर के विग्रहराज चौहान ने समुद्रगुप्त और हर्ष की परम्परा को जीवित रखा। महाराज भोज ने न केवल दर्शन, राजनीति, काव्यशास्त्र और ज्योतिष पर ग्रन्थ लिखे वरन उन्होंने वास्तु पर भी कई ग्रन्थों की रचना की। इस समय दर्शन के क्षेत्र में शंकराचार्य का उदय और वेदान्त की प्रस्तुति युगनिर्देशक घटना थी

Weight 560 g
Dimensions 22.5 × 14.5 × 2.5 cm

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