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Madhyakalin Bharat Ka Itihas (1000-1526 E.)

मध्यकालीन भारत का इतिहास (1000-1526 ई.)

Author(s): Shivkumar Gupt
Language: Hindi
Format: Hardcover
Pages: 365
Edition: Reprint, 2009
Published Year: 1999
ISBN: 81-7056-202-3

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मध्यकालीन भारतीय इतिहास फारसी क्रोनिकल्स के द्वारा प्रगट होता है। इन ग्रन्थों के विवरण मुस्लिम विजेताओं का दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं। जिसे बहुत से इतिहासकारों ने अपरीक्षित रूप से दोहरा दिया है। सल्नतकाल के राजनीतिक इतिहास के विषय में भी यह सत्य है। मध्यकालीन इतिहास का सल्तनत युग राजनीतिक दृष्टि से नितान्त प्रभावहीन था। न तो इस युग में किन्हीं परम्पराओं का जन्म हुआ और न आदर्शों का उन्मेष। इस काल में जिन सुल्तानों ने शासन किया वे किसी उच्च सांस्कृतिक परिवेश की देन नहीं थे। वे तुर्क और अफगान पेशेवर सैनिक थे। जिनके न तो निश्चित आदर्श थे और न परम्पराएँ। वे इस्लाम के उस गौरवमय स्वरूप के प्रतिनिधि नहीं थे जिसका उदय कई शताब्दी पूर्व अरब में हुआ था। बौद्धिक और सांस्कृतिक गतिविधि से इनका कोई सम्बन्ध नहीं था। वे भारत में रूढ़िवादी इस्लाम और जातीयता को लेकर प्रविष्ट हुए थे। उनके साथ सैनिक बर्बरता, दासप्रथा, धार्मिक असहिष्णुता एवं एक उत्पीड़क सैनिक सामन्तवाद का विकास हुआ। इन तुर्क और अफगान सुल्तानों में उत्तराधिकार का निश्चित और सर्वमान्य नियम न होने के कारण प्रायः सैनिक शक्ति के बल पर राज्य प्राप्त किया जाता था। इस युग में प्रायः प्रान्तीय सूबेदारों या गुलामों ने अपनी शक्ति बढ़ाकर राज्य पर अधिकार किया। इल्तुतमिश, जलालुद्दीन खिलजी, अलाउद्दीन खिलजी, मौहम्मद तुगलक, बहलोल लोदी सभी इसी श्रेणी के शासक थे। निरंकुश होने के कारण सुल्तान ही सर्वोपरि होता था। शक्ति के बल पर कभी कुछ अच्छे कार्य हुए भी तो वे शक्ति के हटते ही तिरोहित हो गए। वे कभी भी सिद्धान्त या परम्परा के रूप में परिवर्तित नहीं हुए। सभी सुल्तान कट्टर इस्लामी परम्परा में हिन्दू जनता पर अत्याचार करते रहे।
राजनीतिक दृष्टि से निरर्थक होने पर भी सल्तनत काल में भक्ति के विचार ने इस युग को एक विशिष्ट स्वरूप प्रदान किया। भक्ति की आचार्य और सन्त परम्परा ने पूरे देश को एक नयी आस्था और विश्वास के साथ ईश्वरीय सानिध्य का मार्ग प्रशस्त किया। भक्ति आन्दोलित समाज इस युग की विशिष्ट उपलब्धि थी। इस समय भक्ति के माध्यम से एकेश्वरवाद, व्यक्तिगत देवता की अराधना तथा अनेक संतों के द्वारा सामान्य जीवन में सामाजिक समानता का भाव प्रबल रूप से प्रगट हुआ। इस्लामी सूफीमत पर भी भारतीय भक्ति परम्परा का प्रभाव पड़ा। भारत में प्रचलित होने पर सूफीमत में निःसंदेह तसव्वुफ का प्रभाव बढ़ता गया और अनेक अंशों में उसका भारतीयकरण हुआ। इस दृष्टि से सल्तनत युग में भक्ति आन्दोलन ही इतिहास का एकमात्र उज्जवल पक्ष है।

Weight595 g
Dimensions22.5 × 14.5 × 2.5 cm

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