Gopal Krishna Gokhale: Jeevan Aur Darshan
गोपाल कृष्ण गोखले: जीवन और दर्शन
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स्वतन्त्रता आन्दोलन के दौरान जिन नेताओं का व्यक्तित्व पूरी प्रखरता से उभरा तथा जो आगे आने वाली पीढ़ी के लिए अनुकरणीय बने, उनमें गोपाल कृष्ण गोखले का नाम अग्रणी था। यद्यपि वे काँग्रेस के उदारवादी नेता थे तथापि ‘वे आधुनिक भारत के प्रथम कूटनीतिज्ञ थे।’ गोखले के विषय में के. एम. पन्निकर की यह उक्ति सर्वथा संगत है क्योंकि उनका उदारवाद राष्ट्रीयता की भावना से ओतप्रोत था।
गोखले का व्यक्तित्व बहुआयामी था- विलक्षण प्रतिभा के धनी, शिक्षाविद् एवं शिक्षक, मौलिक विचारक, राजनयिक, अर्थशास्त्री एवं इतिहासविद्। वे जीवन में शिक्षा का महत्त्व समझते थे और भारत की शिक्षा-व्यवस्था को लेकर चिन्तित ही नहीं उसको सुधारने के लिए सक्रिय भी रहे। अनुशासित तथा सिद्धान्तवादी शिक्षक के रूप में उन्होंने प्रतिष्ठा प्राप्त की। शिक्षण कार्य को उन्होंने समाज सेवा मानकर किया तथा राजनीति में उतरने के बाद भी समाज-सेवा से विरत नहीं हुए। वे समाज के बीच में जाकर कार्य करते थे और उसी के लिए उन्होंने भारत सेवक समाज की स्थापना की। भारत सेवक समाज के माध्यम से उन्होंने दलितोत्थान का कार्य पूरी तल्लीनता से किया।
वे एक कुशल और व्यावहारिक राजनीतिज्ञ थे। उन्होंने स्वतन्त्रता आन्दोलन में भाग लिया साथ ही बौद्धिक रूप से ब्रिटिश सरकार की नीतियों की तीखी आलोचना की। प्रशासन में विकेन्द्रीकरण द्वारा अँग्रेजों से सत्ता छीनने का तरीका गोखले ने ही प्रतिपादित किया। गोखले की दृष्टि में राष्ट्रीय एकता के लिए हिन्दू-मुस्लिम एकता आधारभूत तत्त्व थी। उन्होंने राष्ट्रीय एकता के लिए महत्त्वपूर्ण कार्य किया।
स्वयं गाँधीजी की गोखले में बहुत आस्था थी। दुर्गादास ने ठीक ही लिखा है कि ‘गोखले स्वयं एक महामानव थे, लेकिन उनकी प्रसिद्धि किसी सीमा तक इस कारण भी है कि गाँधी ने कई बार उन्हें अपना शिक्षक और राजनीतिक गुरु स्वीकार किया था।’
गोपीनाथ कालभोर द्वारा श्रमपूर्वक लिखी गयी यह पुस्तक गोपाल कृष्ण गोखले के बहुआयामी व्यक्तित्व, उनकी उपलब्धियों तथा उनके जीवन-दर्शन का सरस तथा प्रभावी विश्लेषण करती है।
| Weight | 285 g |
|---|---|
| Dimensions | 22.5 × 14.5 × 1.5 cm |





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