Ehu Janmu Tumhare Lekhe
इहु जनमु तुमारे लेखे (औपन्यासिक आत्मकथा)
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Ehu Janmu Tumhare Lekhe डॉ. मनमोहन सहगल की यह औपन्यासिक आत्मकथा एक लेखक के जीवन के संघर्षों, अनुभवों और चरैवेति के संकल्प की सपाट बयानी प्रस्तुत करती है। यह कृति पाठकों के लिए अरोचक कुछ भी नहीं छूती और जीवन की घटनाओं को कथा-रस के साथ अभिव्यक्त करती है, साधारण घटक के भीतर झाँकने की रोचक संभावनाएँ प्रदान करती है।
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आत्मकथा लिखते हुए एक-एक संदर्भ की सूक्ष्म व्याख्या करने बैठते, तो यह पुस्तक दो हजार पृष्ठों में भी समा न पाती। अतः मैंने महत्त्वपूर्ण कुछ छोड़ा नहीं और पाठकों के लिए अरोचक कुछ छुआ नहीं। अति संक्षेप में मैंने अपनी बात कही है और यथेष्ट दिशा भी सुझाई है। निश्चय ही यह आत्मकथा किसी राष्ट्रीय स्तर के व्यक्तित्व की नहीं, न ही किसी मंत्री या प्रधानमंत्री की है, इसमें उपलब्ध है मात्र एक लेखक, गढ़ा जाता हुआ लेखक। सबल जीवन की चाह में सदा डर-डर कर जीने वाले लेखक की सपाट बयानी और निरन्तर संघर्षपूर्वक चरैवेति का संकल्प, यदि कोई राह दे सके, तो ग्राह्य ही कहा जाएगा। लेकिन दावा कोई नहीं।
पुस्तक ‘इहु जनमु तुमारे लेखे’ जैसी भी है, इसमें अपने जीवन की घटनाओं को कथा-रस भरते हुए अभिव्यक्ति दी है। साधारण घटक के भीतर झाँकने की सम्भावना बिना रोचकता के नहीं हो पाती। इस स्थिति में रोचकता का दावा मैं कर सकता हूँ, शेष कथन पाठकों पर छोड़ता हूँ।
| Weight | 400 g |
|---|---|
| Dimensions | 22 × 14.5 × 1.5 cm |
| Genre |









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