Alankar Parijat
अलंकार पारिजात
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Alankar Parijat भारतीय काव्यशास्त्र में अलंकारों का महत्व निर्विवाद है। डॉ. हेतु भारद्वाज और डॉ. रमेश मयंक की यह कृति काव्य के विभिन्न उपकरणों का सम्यक् और सोदाहरण विवेचन करती है। यह भारतीय तथा पश्चिमी काव्यशास्त्र की अवधारणाओं का विश्लेषण करती है, जो काव्य के मूल्यांकन और रचनाकार के उपकरण को समझने में पाठकों की मदद करती है।
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भारतीय काव्यशास्त्र में माना गया है कि साहित्य का रसास्वदन वही व्यक्ति पूरी रागात्मकता के साथ कर सकता है जिसे विभिन्न काव्यांगों की विशद् जानकारी है। इसका कारण यह है कि रचनाकार काव्य की रचना करते समय उन उपकरणों का विशेष ध्यान रखता है जो उसकी रचना को सुन्दर और हृदयस्पर्शी बनाते हैं। संस्कृत में इन उपकरणों का बहुत व्यापक और वैज्ञानिक अध्ययन आचार्यों ने किया है। काव्य के भावपक्ष (रस) तथा कलापक्ष (अलंकार, छंद-रीति, गुण आदि) की जो व्याख्या आचार्यों ने की है, वह काव्य के मूल्यांकन में हमारी मदद करती है।
काव्यशास्त्र के विकास की एक सुदृढ़ परम्परा भारत में रही है तथा आचार्यों ने समय-समय पर काव्यांगों के बदलते रूपों का विश्लेषण किया है। आधुनिक काल में तो पाश्चात्य काव्य-उपकरणों का उपयोग भी कवियों ने खूब किया है। ‘मानवीकरण’ अलंकार इसका सबसे प्रमुख उदाहरण है। इसी तरह आधुनिक हिन्दी कविता का छंद-विधान पाश्चात्य काव्यशास्त्र से भी प्रभावित है।
इस पुस्तक में लेखकद्वय ने काव्य के विभिन्न उपकरणों का सम्यक तथा सोदाहरण विवेचन किया है। साथ ही उन्होंने काव्यशास्त्र की भारतीय तथा पश्चिमी अवधारणाओं का भी विश्लेषण किया है। लेखकों का प्रयास रहा है कि काव्य के हर उपकरण के उपयुक्त तथा पर्याप्त उदाहरण पाठकों को मिलें ताकि पाठकों को अन्यत्र न भटकना पड़े। इस दृष्टि से काव्य के विभिन्न उपकरणों के विवेचन पर यह एक समग्र कृति है।
| Weight | 425 g |
|---|---|
| Dimensions | 22.5 × 14.5 × 2 cm |
| Genre |















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