Swatantrayootra Hindi Upanyason Me Nari Ki Rajanetik Chetna
स्वातंत्र्योत्तर हिंदी उपन्यासों में नारी की राजनीतिक चेतना
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राजनीति आज के वातावरण में पूरी तरह घुल-मिल गयी है तथा जीवन का कोई क्षेत्र ऐसा नहीं जो राजनीति से अछूता हो। सामंती तथा लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में यही तो अन्तर है कि सामंतवाद में आमजन की कोई महत्ता नहीं है जबकि लोकतंत्र में हर व्यक्ति उसकी राजनीति का का अपरिहार्य अंग है। इसलिए लोकतंत्र ने सभी को राजनीति के बीच ला खड़ा किया है।
किन्तु राजनीति की रपटीली राह में स्त्री का चलना सरल नहीं है तथापि स्त्री-चेतना ने न केवल राजनीति को जज्ब किया है बल्कि उसे अपने जीवन में पूरी तरह उतार लिया है। राजनैतिक रूप से चैतन्य नारी अपने अधिकारों के प्रति पूर्ण सजग हो गयी है। उसने अपने कार्यक्षेत्र को विस्तार दिया है और सर्वत्र अपनी क्षमताओं से अपना स्थान बनाया है। वह अब न भोग की वस्तु रही है न घर के चूल्हे-चौके तक सीमित। वह न अब एक देह मात्र है न केवल प्रेम की मूर्ति। वह अपनी प्रखर राजनीतिक चेतना से राष्ट्र के जीवन में सक्रिय हस्तक्षेप कर रही है।
स्वातंत्र्योत्तर काल में नारी की राजनीतिक चेतना के उभार ने उसे संघर्ष के केन्द्र में ला खड़ा किया है। उसके इस रूप का चित्रण हमारे उपन्यासकारों ने अपनी कृतियों में समग्रता के साथ किया है। इन उपन्यासों में जहाँ राजनीतिक बदलाव से नारी जीवन में परिवर्तन की प्रक्रिया का विश्लेषण है वहीं नारी की संघर्ष क्षमता की गाथा है। डॉ. रुचि कश्यप की प्रस्तुत कृति स्त्री चेतना से नारी जीवन में आए बदलावों, संघर्षों, विद्रूपों तथा समस्याओं का आकलन हिन्दी उपन्यास के माध्यम से करती है। स्त्री विमर्श के क्षेत्र में यह कृति एक नयी सम्भावना है क्योंकि लेखिका ने यह विश्लेषण नारी की राजनीतिक चेतना के संदर्भ में किया है।
| Weight | 355 g |
|---|---|
| Dimensions | 22.5 × 14.5 × 1.5 cm |





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