Samajvad Ka Hamshakal
समाजवाद का हमशक्ल
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संवेदनहीनता से जड़ होती जिन्दगी की असंगत धारणाओं को कहानियों में पिरोने का एक सफल प्रयास है यह संकलन। सभी कहानियाँ देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में स्थान पा चुकी हैं। भाषा में प्रवाह होने से पठनीयता का दायरा बढ़ा है। लेखिका का अनुभव क्षेत्र बड़ा होने से कहानियों का कथ्य भी नयेपन के साथ आया है। ये कहानियाँ धारणाएँ और निर्मूल विसंगतियों को गहरी अनुभूति दे सकी है। इस दृष्टि से रोचक संवाद का फलक व्यापकता के साथ उभरा है। ऐसा नहीं लगता कि यह लेखिका का पहला कथा-संग्रह है, क्योंकि विषय की पड़ताल कथा लेखिका गहराई के साथ करने में सफल रही है।
मूल्यों की गिरावट और जीवन को सतही तौर पर आँकने का इंसान का जो स्वरूप दिनोंदिन सामने आ रहा है, लेखिका उनको सृजन का माध्यम बनाकर पूरी पैठ के साथ पड़ताल करने में समर्थ है। यही नहीं लेखिका के इर्द-गिर्द का परिवेश नपा-तुला न होकर सम्पूर्णता के साथ विविध आयामों को सहेजने समेटने में भी कारगर है। कहानियों में कथानक की कसावट तथा रचने की क्षमता का भी विस्तार हुआ है।
विश्वास है पाठकों को कहानियाँ पसन्द आयेंगी और हिन्दी की समकालीन कहानी में भी संग्रह पहचान दे पायेगा। इसी आशा और विश्वास के साथ यह संग्रह हिन्दी पाठकों को प्रस्तुत है।
| Weight | 230 g |
|---|---|
| Dimensions | 22.5 × 14.5 × 1 cm |


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