Sadak Kinare Ki Kahaniya
सड़क किनारे की कहानियाँ
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प्रेमकृष्ण शर्मा द्वारा रचित कहानी-संग्रह ‘सड़क किनारे की कहानियाँ’ प्रेमचंद की प्रगतिशील यथार्थवादी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए आमजन, शोषितों और वंचितों के जीवन-संघर्ष को स्वर देता है। पेशे से अधिवक्ता और जनवादी कार्यकर्ता लेखक ने ‘सफाई कर्मी रैना’, ‘मरखू’ और ‘बीच सड़क पर’ जैसी कहानियों के जरिए सड़क किनारे बिखरे अभावग्रस्त पात्रों के अस्तित्व की लड़ाई और सामाजिक विद्रूपताओं का मर्मस्पर्शी चित्रण किया है।
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सड़क किनारे की कहानियाँ’ प्रसिद्ध कथाकार और जनवादी कार्यकर्ता प्रेमकृष्ण शर्मा का एक अत्यंत सशक्त, विचारोत्तेजक और मानवीय संवेदनाओं से ओत-प्रोत कहानी-संग्रह है। यह कृति हिन्दी कथा-साहित्य की उस समृद्ध परंपरा का स्वाभाविक विस्तार है, जिसकी नींव मुंशी प्रेमचंद ने ‘कफ़न’, ‘पूस की रात’, ‘ठाकुर का कुआँ’ और ‘सद्गति’ जैसी अमर रचनाओं के जरिए रखी थी। प्रेमचंद के बाद जैनेंद्र, यशपाल, अश्क, अमरकांत, कमलेश्वर और शेखर जोशी जैसे मूर्धन्य रचनाकारों ने जिस यथार्थवादी दृष्टि और वंचित वर्ग की पक्षधरता को आगे बढ़ाया, प्रेमकृष्ण शर्मा की कहानियाँ उसी सामाजिक चेतना और लोकतांत्रिक मूल्यों को पूरी प्रामाणिकता के साथ सशक्त करती हैं।
पेशे से अधिवक्ता और पीयूसीएल (PUCL) जैसे मानवाधिकार संगठनों से जुड़े होने के कारण लेखक के लिए कहानी-लेखन केवल एक साहित्यिक विधा नहीं, बल्कि एक सक्रिय सामाजिक हस्तक्षेप और रचनात्मक ‘एक्टिविज़्म’ है। समाज की विसंगतियों, गैर-बराबरी और व्यवस्थागत शोषण को लेखक ने अत्यंत निकटता से देखा और महसूस किया है। यही कारण है कि उनकी कहानियों के केंद्र में बड़े महलों की चमक-दमक के बजाय सड़क के किनारों पर बिखरा, संघर्ष करता और उपेक्षित आम आदमी है।
इस संग्रह में संकलित कहानियाँ—जैसे ‘सफाई कर्मी रैना’, ‘मन की अँधेरी गली’, ‘सड़क किनारे की कहानी’, ‘मरखू’ और ‘बीच सड़क पर’—शीर्षकों से ही स्पष्ट कर देती हैं कि इनके पात्र समाज के किस पायदान से आते हैं। ये सभी पात्र अभावग्रस्त और शोषित वर्ग के प्रतिनिधि हैं, जो दैनिक जीवन की त्रासदियों और संकीर्णताओं के बीच अपने अस्तित्व और सम्मान की लड़ाई पूरी शिद्दत से लड़ रहे हैं। लेखक का उद्देश्य केवल इन पात्रों के दुखों का रुदन करना नहीं, बल्कि एक ऐसे समाज का ‘अनदेखा सपना’ देखना है जो हर तरह के भेदभाव, रूढ़ियों और संकीर्णताओं से पूरी तरह मुक्त हो।
यह संग्रह पाठक को मात्र एक दर्शक बनाकर नहीं छोड़ता, बल्कि उसे इन उपेक्षित पात्रों की पीड़ा और उनके संघर्ष में मानसिक रूप से भागीदार बनाता है। लेखक सड़क किनारे की इस मूक और अदृश्य दुनिया को समाज के मुख्य पटल पर लाकर पाठकों की मानवीय चेतना को झकझोरते हैं। प्रगतिशील सोच, यथार्थवादी सामाजिक सरोकारों और हाशिए के लोगों के सच्चे जीवन-संघर्ष को गहराई से समझने वाले हर पाठक और साहित्य-प्रेमी के लिए यह पुस्तक एक अनिवार्य और यादगार पठनीय अनुभव प्रदान करती है।
| Weight | 150 g |
|---|---|
| Dimensions | 21.5 × 11 × 0.75 cm |





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