Rastriya Mahila Aayog Aur Bharatiya Nari
राष्ट्रीय महिला आयोग और भारतीय नारी
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आज के विश्व मानव समाज में महिला को मानवीयोचित न्याय नहीं मिल रहा है। पुरुष की अहंकारी मनोवृत्ति ने नारी को सदा पीछे धकेला है किन्तु आज के भौतिक अर्हताओं से चमत्कृत रूप पहले इस संसार में पुरुष नारी के सहयोग के बिना सुख व शान्ति व सन्तोष का जीवन नहीं जी सकता है। अब पुरुष के पास कोई विकल्प शेष नहीं रहा है। अपनी दर्पिता के साथ नारी को उपेक्षित उत्पीड़ित कर, त्रासित, शोषित व संवेदित कर आगे नहीं बढ़ सकता है।
संयुक्त राष्ट्र संघ ने 1948 में सबके लिये समान अधिकार का नारा दिया है और विश्व जनसंख्या का आधा भाग जो नारी जगत का है, इसको अब नारी को हर क्षेत्र में चाहे सामाजिक हो, सांस्कृतिक हो, आर्थिक हो, विधिक हो, नैतिक हो-अधिकार देने ही होंगे। इस सन्दर्भ में भारत में भी राष्ट्रीय महिला आयोग का गठन किया गया है, जिससे यह अपेक्षा है कि विकास की दौड़ में नारी की पुरुष के साथ साधिकार मानवीय सहभागिता सुनिश्चित करे।
राष्ट्रीय महिला आयोग का अभी शैशव काल ही है। इसका योगदान अभी उल्लेखनीय नहीं है, इससे महिला जगत को अत्याधिक अपेक्षाएँ हैं, अभी तो यह आयोग अपनी पहचान बना रहा है और इसका कार्य- क्षेत्र व इसके अधिकार भी सुनिश्चित नहीं हैं। सरकारों से इसको पूर्ण अपेक्षित सहयोग भी नहीं मिल पा रहा है। फिर भी सीमित साधनों से नारी-अधिकारों के लिये संघर्ष करने में यह आयोग जुट गया है। भारतीय जीवन दर्शन आशावादी है और आशा ही जीवन है, इस विचारधारा के आधार पर शाश्वत जीवन जीता आया है। इसी संदर्भ में राष्ट्रीय महिला आयोग से उपेक्षित महिला जो वस्तुतः ‘महि’ = अर्थात् उत्सव व ‘ला’ अर्थात् जननी = पुरुष के जीवन में उत्साह, उल्लास व हर्ष की जननी रूप या स्थायी अस्तित्व मान ‘स्त्री’ नाम धन्या बनकर मुग्ध भाव से रहती है, अनेकों अपेक्षाएँ रखती है। महिला जगत की इन अपेक्षाओं का यह पुस्तक प्रतिबिम्ब स्वरूप है।
| Weight | 450 g |
|---|---|
| Dimensions | 22.5 × 14.5 × 2 cm |





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