Rashtriya Asimiti aur Aarya Samaj
राष्ट्रीय अस्मिता और आर्य समाज
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उन्नीसवीं शताब्दी में भारतीय समाज में व्याप्त मिथ्या आडंबरों और अंधविश्वासों के विरुद्ध महर्षि दयानंद और आर्य समाज के पुनरुत्थानवादी आंदोलन का विश्लेषण। यह पुस्तक राष्ट्रीय अस्मिता, स्वदेशी और स्वभाषा के प्रसार में आर्य समाज के योगदान को दर्शाती है।
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उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में देश का सांस्कृतिक वैभव एवं वैदिक संस्कृति पतनोन्मुख थी। भारत में ईसाई और इस्लाम का प्रभाव बढ़ रहा था। ऐसे संक्रमण काल में महर्षि दयानन्द और उनके द्वारा संस्थापित आर्य समाज ने भारतीय समाज में व्याप्त मिथ्या आडम्बरों, अन्धविश्वासों, मत-मतान्तरों को दूर करने, वैदिक संस्कृति के सभी सम्प्रदायों को एक सूत्र में संगठित करने तथा धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक और शैक्षिक सुधारों के रूप में पुनरुत्थानवादी आन्दोलन का विकास किया। राष्ट्रभाषा हिन्दी का प्रसार, स्त्री- पुनरुत्थान, शुद्धि और दलितोद्धार आन्दोलन आदि से सामाजिक पुनर्जागरण सम्भव हो सका।
इस आन्दोलन से स्वदेशी, स्वभाषा, स्वधर्म, लोगों में आत्म सम्मान और आत्मविश्वास जागृत कर स्वराष्ट्र की भावना को प्रबल बनाया तथा लोगों में राजनीतिक जागरण का सूत्रपात हुआ, जिसकी परिणति राष्ट्रीय स्वाधीनता प्राप्ति के रूप में हुई।
भारतीय समाज में सामाजिक सुधार एवं राजनीतिक जागरण का प्रस्फुटन आर्य समाज की एक अमूल्य देन है।
| Weight | 370 g |
|---|---|
| Dimensions | 22.5 × 14.5 × 1.5 cm |
| Genre |







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