Mishrabandhu Aur Hindi Alochana
मिश्रबंधु और हिंदी आलोचना
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शम्भुनाथ ने मिश्रबन्धु के आलोचक व्यक्त्तित्व का पुनर्मूल्यांकन बड़ी निष्ठा, तत्परता और सहानुभूतिपूर्वक किया है। उन्होंने मिश्रबन्धु की इतिहासदृष्टि पर भी नए सिरे से विचार करते हुए परवर्ती इतिहासग्रन्थों पर उसके प्रभाव को भी रेखांकित किया है और इतिहासलेखक आलोचक मिश्रबन्धु की छवि को नयी दीप्ति देने की कोशिश की है। शम्भुनाथ ने निश्चय ही मिश्रबन्धु के आलोचनात्मक प्रदेय का पुनर्मूल्यांकन करके ऐतिहासिक महत्त्व का कार्य किया है। उनकी भाषा साफ-सुथरी और परिमार्जित है। उनमें साहित्य की अच्छी समझ है।
-प्रो. रामचन्द्र तिवारी
मिश्रबन्धु ने अपने समय की सीमा में आलोचना एवं इतिहासलेखन के क्षेत्र में बहुत महत्त्वपूर्ण कार्य किया है। आलोचकों ने इनके कार्य को अपेक्षित गम्भीरता से नहीं लिया। शम्भुनाथ ने इनके कार्य का पुनर्मूल्यांकन करके उनके वास्तविक महत्त्व को रेखांकित किया है। शम्भुनाथ का यह समीक्षाकार्य भारतेन्दुयुग और द्विवेदीयुग के समस्त आलोचनाकर्म की यात्रा करता हुआ परम्परा और समसामयिकता के परिप्रेक्ष्य में मिश्रबन्धु के आलोचनाकर्म और इतिहासलेखन का प्रभावशाली आकलन करता है।
-प्रो. रामदरश मिश्र
इस विद्वत्तापूर्ण एवं मौलिकतासम्पन्न ग्रन्थ में महान् आलोचक मिश्रबन्धु पर तो सम्यक् प्रकाश डाला ही गया है, उनके विविध विधागत स्फीत सर्जन का परिचय भी कराया गया है। विद्वान लेखक ने मिश्रबन्धु के साथ न्याय किया है, पक्षपात नहीं। ग्रन्थ में वस्तुपरकता का आद्यन्त निर्वाह किया गया है, जिसके कारण शोधमूल्य रक्षित रहे हैं। …… इस ग्रन्थ के प्रकाशन से उन महान् हिन्दी सेवकत्रय से न्याय का पथ प्रशस्त होगा, जो आज से सौ या अधिक साल पहले गाँव-गाँव की खाक छानते हुए कविवृत्तविभूति बटोरने का सुदीर्घ तप करते रहे थे,….. मुझे विश्वास है कि इस मौलिक, प्रचलनमुक्त्त एवं व्यायनिष्पन्न ग्रन्थ का आदर होगा, क्योंकि यह आदर का पात्र है।
-डॉ. रामप्रसाद मिश्र
| Weight | 530 g |
|---|---|
| Dimensions | 22.5 × 14.5 × 3 cm |



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