Madhyayugin Aur Arvachin Hindi Sahitya: Ek Vimarsh
मध्ययुगीन और अर्वाचीन हिंदी साहित्य: एक विमर्श
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Madhyayugin Aur Arvachin Hindi Sahitya: Ek Vimarsh साहित्य के विशाल और गहन समुद्र में ज्योति और मोती खोजने का काम आलोचक करता है। डॉ. सुरेन्द्र प्रसाद की यह कृति उनकी गहरी पारखी-दृष्टि, संवेदनशीलता और शास्त्रज्ञान की गरिमा का परिचय देती है। यह कबीर के काव्य के दार्शनिक पक्ष, बच्चन के काव्य में मस्ती, और समकालीन युवा आक्रोश की अनुगूँजों सहित साहित्य के विस्तृत फलक का वैविध्यपूर्ण मानचित्र प्रस्तुत करती है।
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साहित्य का क्षेत्र आकाश की तरह विस्तृत और सागर की तरह अथाह होता है। रचनाकार का इस अपार साहित्य संसार में ज्योति और मोती खोजने का काम करता है। आलोचक इस ज्योति की किरणों तथा मोती की चमक का आस्वाद पाठक तक पहुँचाने का काम करता है। यह तब तक सम्भव नहीं है जब तक आलोचक की दृष्टि भी उतनी व्यापक न हो। सुप्रसिद्ध आलोचक डॉ. सुरेन्द्र प्रसाद ने प्रस्तुत कृति में संकलित इन निबन्धों में अपनी गहरी पारखी-दृष्टि, संवेदनशीलता तथा शास्त्रज्ञान की गरिमा का परिचय दिया है।
इन निबन्धों में लेखक ने साहित्य के विस्तृत फलक का कोना-कोना छाना है। यहाँ कबीर के काव्य के दार्शनिक पक्ष का रागात्मक विवेचन है तो बच्चन के काव्य में विन्यस्त मस्ती का आकलन है, सर्वेश्वर के काव्य के संदर्भ में मानव मुक्ति के स्वप्न का खुलासा है तो समकालीन युवा आक्रोश की अनुगूंजें हैं, उपन्यास तथा कहानी के रचनात्मक सौष्ठव का अनुशीलन है तो ललित निबन्ध के लालित्य की व्याख्या है, पंत के काव्य में राष्ट्रीय चेतना के स्वरों की खोज है तो चन्द्रकान्त बांदिवडेकर के समीक्षा कर्म का मूल्यांकन है।
स्पष्ट है कि लेखक का अध्ययन बहुत विपुल है तथा इस कृति का हर निबन्ध अपने विषय प्रतिपादन की दृष्टि से पूर्ण है। इस कृति के निबन्ध जहाँ डॉ. सुरेन्द्र प्रसाद की आलोचना- दृष्टि का परिचय देते हैं वहीं एक बहुत बड़े साहित्यिक परिदृश्य का वैविध्यपूर्ण मानचित्र भी प्रस्तुत करते हैं।
| Weight | 265 g |
|---|---|
| Dimensions | 22.5 × 14.5 × 1 cm |





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