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Khule Darvajon ki kaid

खुले दरवाज़ों की कैद

Language: Hindi
Format: Hardcover
Pages: 128
Edition: First, 2017
ISBN: 978-81-88418-50-3

Original price was: ₹250.00.Current price is: ₹225.00.

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फाँसी के कैदियों की जेल पृष्ठभूमि पर आधारित यह मार्मिक नाटक, बूढ़े संतरी सिराजुद्दीन की आंतरिक उथल-पुथल को दर्शाता है। यह मानवीय भाव-संवेदनाओं की जटिलता और जेल के ‘खुले दरवाज़ों की क़ैद’ का गहरा अहसास कराता है।

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पारसमणि’, ‘ढाई आखर’, ‘ज्योतिपुरुष’, ‘बर्फ का दर्द’ तथा ‘यक्षकथा’ के क्रम में लेखक का छठा पूर्ण नाटक। नाटक ‘खुले दरवाजों की कैद’ की पृष्ठभूमि फाँसी के कैदियों की जेल तथा उसमें एक निश्चित अवधि तक समय व्यतीत कर जीवनाकाश में से किसी टूटे तारे के समान सहसा विलीन हो जाने वाले कैदियों की आन्तरिक ऊहापोह और उद्वेलन पर आधारित है।

नाटक की सम्पूर्ण कथा का ताना-बाना जेल के बूढ़े सन्तरी सिराजुद्दीन के इर्द-गिर्द बुना गया है। वही नाटक का केन्द्रीय पात्र भी है तथा सभी पक्षों को किसी न किसी रूप में प्रभावित भी करता है। अपनी अत्यधिक भाव-संवेदना के कारण वह हर आने-जाने वाले क़ैदी से सहज ही जुड़ जाता है, तिस पर अपनी पुत्री की दहेज हत्या से आक्रोशित अपने एकमात्र पुत्र गुलशन की उसी जेल में हुई फाँसी के बाद तो वह इतना आहत हो जाता है कि जेल के हर क़ैदी में वह अपने ‘गुलशन’ को तलाशता है और जब नियत दिन वह क़ैदी फाँसी पर लटका दिया जाता है तो उसे लगता है कि उसका ‘गुलशन’ फिर मर गया।

भाव-संवेदना की इसी जटिलता में वह निरंतर उलझता चला जाता है। स्थिति यहाँ तक विकट हो जाती है कि वह रिटायरमेंट के बाद भी वहाँ से अपने घर नहीं जा पाता। इस प्रकार वही जेल उसके लिए ‘खुले दरवाजों की क़ैद’ बन जाती है।

जटिल भाव-संवेदनाओं की ऐसी ही उठापटकियों के बीच कथा कब अपने ‘लक्ष्य’ तक जा पहुँचती है, इसका आभास तक किसी को नहीं हो पाता।

Weight280 g
Dimensions22.5 × 14.5 × 1 cm
Genre

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