Bade Aadmi
बड़े आदमी
Original price was: ₹200.00.₹180.00Current price is: ₹180.00.
You Save 10%
Bade Aadmi पूरन सरमा का व्यंग्य-संग्रह ‘बड़े आदमी’ विद्रूप चेहरों पर गहरी चोट करता है और उन विसंगतियों को उकेरता है जो हमारे परिवेश में रच-बस गई हैं। यह संग्रह मानवीय मुद्राओं को नई बुनघट से नये मुहावरे में गूँथता है, जिसमें बिखरते मूल्यों को सहेजने की सघन वकालत है। व्यंग्यों की शैली नूतन प्रयोगों के साथ उद्घाटित होती है, जिसमें कलात्मक अनुशासन और विनोद भाव दोनों प्रकट होते हैं।
In stock
बड़े आदमी’ में विद्रूप चेहरों पर गहरी चोट है तथा उन विसंगतियों को उकेरा गया है, जो हमारे परिवेश में रच-बस गई हैं। इस व्यंग्य-संग्रह की तमाम व्यंग्य रचनाएँ किसी गहरे अवसाद को बहुत ही नये शिल्प में बुनती हैं तथा सुधार का मार्ग सुझाती हैं। ‘बड़े आदमी’ के चेहरे अनेक हैं, लेकिन बड़प्पन का भाव आज के तथाकथित ‘बड़े आदमी’ में दिखाई नहीं देता।
यह व्यंग्य संकलन भाव सम्प्रेषण की दृष्टि से इसलिए सफल है कि इसमें मानवीय मुद्राओं को नई बुनघट से नये मुहावरे में गूँथा गया है। इन रचनाओं में बिखरते मूल्यों को सहेजने की सघन वकालात है। व्यंग्यों की शैली नूतन प्रयोगों के साथ उद्घाटित होती है तथा व्यंग्यों में एक कलात्मक अनुशासन और विनोद भाव दोनों प्रकट होते हैं। कई एक रचनायें कलेवर में छोटी हैं लेकिन उनका फलक व्यापक है। जिन विद्रूपताओं और असंगत धारणाओं की अनदेखी की जाती है, व्यंग्यकार ने उन्हें बखूबी पहचाना है।
‘बड़े आदमी’ व्यंग्य-संग्रह पाठकों को रंजक भाव सम्प्रेषण के प्रति तो आश्वस्त करता ही है, साथ ही वह अपने आसपास के परिवेश के लिए सोचने को भी विवश करता है। पाठक ही असली कसौटी होता है, उसी के लिए यह संग्रह प्रस्तुत है। विश्वास है इसका मूल्यांकन भी वे ही करेंगे। हमारे चारों ओर फैली गंदगी को समेटने और उसे नूतन भाव बोध के साथ प्रस्तुत करने के लिए व्यंग्यकार के शिल्प कौशल को देखना भी सुधी पाठकों के ही हाथ में है। नये तेवर और तल्ख भाव भंगिमाओं वाले इस संग्रह के व्यंग्य कुछ तो कहना चाहते ही हैं, इस स्वीकारोक्ति और विनोद भाव सम्प्रेषण के लिए संग्रह सार्थक पहचान की पहल को हिन्दी व्यंग्य साहित्य जगत को प्रस्तुत करता है।
| Weight | 365 g |
|---|---|
| Dimensions | 22.5 × 14.5 × 1.5 cm |
| Genre |









Ritikalin Kavya Sankalan
Vyashti Arthshastra
Sansadan Prabandhan
Bharat ka Itihas (750 CE to 1707 CE )
Reviews
There are no reviews yet.