Aadhunik Hindi Upanyas aur Stri Vimarsh
आधुनिक हिंदी उपन्यास और स्त्री विमर्श
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Aadhunik Hindi Upanyas aur Stri Vimarsh बीसवीं सदी के अंतिम दशकों में उभरे स्त्री विमर्श ने साहित्य के परिदृश्य को बदला। सुभाषचंद्र घायल की ‘आधुनिक हिन्दी उपन्यास और स्त्री विमर्श’ कृति इस विमर्श के विविध आयामों, स्त्री अस्मिता, पारिवारिक व सामाजिक हैसियत, शोषण और अधिकारों की प्रासंगिकता का वस्तुपरक विश्लेषण करती है। यह पुस्तक हिन्दी उपन्यासों द्वारा स्त्री विमर्श को दिए गए विस्तार और स्त्री की स्थिति को प्रदान की गई महत्ता को गंभीरता से विचार करती है।
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बीसवीं सदी के अन्तिम दशकों में हिन्दी साहित्य में दलित विमर्श, आदिवासी विमर्श, स्त्री विमर्श जैसे विमर्शों की उपस्थिति ने साहित्य के परिदृश्य को बदला। वैश्वीकरण तथा उदारीकरण के प्रभाव ने भी इन विमर्शों को धार दी और स्त्री विमर्श को केन्द्रीयता प्रदान की। परिचय में उभरे स्त्री-स्वातंत्र्य आन्दोलन ने भारत में भी नये-नये आकार ग्रहण किए तथा चिंतन के स्तर पर यह तथ्य उभरा कि स्त्री एक वस्तु नहीं एक जीवंत और जीवित इकाई है तथा उसकी अपनी अस्मिता है। उसे स्वतंत्रता के साथ जीने का अधिकार है।
स्त्री अस्मिता के स्वातंत्र्य को सर्वाधिक स्थान दिया हिन्दी उपन्यास ने तथा इस विमर्श को केन्द्रीयता प्रदान करने में उपन्यास विधा का सर्वाधिक योगदान रहा। इस दिशा में महिला तथा पुरुष उपन्यासकारों की सक्रिय भागीदारी रही। स्त्री विमर्श के विविध आयाम, स्त्री अस्मिता, स्त्री की पारिवारिक तथा सामाजिक हैसियत, स्त्री देह का शोषण तथा उसके अधिकारों की प्रासंगिकता जैसे जलते सवालों ने इस विमर्श के दायरे को विस्तार दिया है।
डॉ. सुभाष चन्द्र धायल की ‘आधुनिक हिन्दी उपन्यास और स्त्री विमर्श’ कृति इस विमर्श के विविध आयामों का वस्तुपरक विश्लेषण करती है। हिन्दी उपन्यासों ने इस विमर्श को जिस प्रकार विस्तार दिया है, स्त्री की स्थिति को महत्ता प्रदान की है, उन महत्त्वपूर्ण सवालों पर यह कृति गम्भीरता और तटस्थता से विचार करती है तथा स्त्री विमर्श की सफलता-असफलता एवं प्रासंगिकता को समझने में पाठक की पूरी मदद करती है। यह पुस्तक समग्रता में इस विमर्श के संदर्भ में हिन्दी उपन्यास की रचनात्मक व्याख्या करती है।
| Weight | 415 g |
|---|---|
| Dimensions | 22.5 × 14.5 × 2 cm |
| Genre |





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