Surendra Prasad

डॉ. सुरेन्द्र प्रसाद हिन्दी साहित्य के प्रतिष्ठित शिक्षाविद्, शोधकर्ता एवं समीक्षक हैं। उनका जन्म 5 नवम्बर 1960 को हुआ। उन्होंने मुंबई विश्वविद्यालय, मुंबई से एम.ए. एवं पीएच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त कीं। हिन्दी भाषा एवं साहित्य के अध्ययन, अध्यापन तथा शोध के क्षेत्र में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है। वे मुंबई विश्वविद्यालय के हिन्दी अध्ययन से संबंधित शैक्षणिक गतिविधियों एवं अकादमिक विमर्शों से भी सक्रिय रूप से जुड़े रहे हैं।

डॉ. प्रसाद की रुचि विशेष रूप से आधुनिक हिन्दी साहित्य, कथा-साहित्य एवं साहित्यिक आलोचना के क्षेत्र में रही है। उनकी प्रमुख कृतियों में मार्कण्डेय का रचना-संसार (कथा-साहित्य के विशेष संदर्भ में), कैंपस का सच और दीक्षांत, मध्ययुगीन और अर्वाचीन हिन्दी साहित्य : एक विमर्श तथा साठोत्तरी हिन्दी कहानी साहित्य में चित्रित ग्रामीण समस्याएँ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

उनके शोधपरक लेख एवं समीक्षाएँ विभिन्न राष्ट्रीय स्तर की पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं। हिन्दी साहित्य के विविध पक्षों पर उनका लेखन गंभीर अध्ययन, आलोचनात्मक दृष्टि तथा साहित्यिक संवेदनशीलता का परिचायक है।

अध्यापन, शोध एवं लेखन के माध्यम से डॉ. सुरेन्द्र प्रसाद ने हिन्दी साहित्य के अध्ययन और आलोचना को समृद्ध बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उनकी कृतियाँ विद्यार्थियों, शोधार्थियों तथा हिन्दी साहित्य के अध्येताओं के लिए उपयोगी संदर्भ सामग्री के रूप में प्रतिष्ठित हैं।

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  • Sale! Sathottari Hindi Kahani Sahitya mein Chitrit Gramin Samasyein

    Sathottari Hindi Kahani Sahitya mein Chitrit Gramin Samasyein

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    Sathottari Hindi Kahani Sahitya mein Chitrit Gramin Samasyein भारत एक कृषि प्रधान देश है और इसकी सामाजिक संरचना ग्रामीण जीवन पर टिकी है। डॉ. सुरेन्द्र प्रसाद की यह आलोचना कृति साठोत्तरी हिन्दी कहानी साहित्य में चित्रित ग्रामीण समस्याओं का समाजशास्त्रीय, नृशास्त्रीय, राजनीतिक और साहित्यिक दृष्टि से मूल्यांकन करती है। यह रेणु, मार्कण्डेय, शेखर जोशी जैसे कहानीकारों द्वारा चित्रित बदलते ग्रामीण जीवन का जीवंत दस्तावेज है।

  • Sale! Madhyayugin Aur Arvachin Hindi Sahitya: Ek Vimarsh

    Madhyayugin Aur Arvachin Hindi Sahitya: Ek Vimarsh

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    Madhyayugin Aur Arvachin Hindi Sahitya: Ek Vimarsh साहित्य के विशाल और गहन समुद्र में ज्योति और मोती खोजने का काम आलोचक करता है। डॉ. सुरेन्द्र प्रसाद की यह कृति उनकी गहरी पारखी-दृष्टि, संवेदनशीलता और शास्त्रज्ञान की गरिमा का परिचय देती है। यह कबीर के काव्य के दार्शनिक पक्ष, बच्चन के काव्य में मस्ती, और समकालीन युवा आक्रोश की अनुगूँजों सहित साहित्य के विस्तृत फलक का वैविध्यपूर्ण मानचित्र प्रस्तुत करती है।

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