Vinoba Bhave Bhudan Yag Praneta
विनोबा भावे भूदान यज्ञ प्रणेता
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Vinoba Bhave Bhudan Yag Praneta “तेरी पुकार सुनकर तेरे पीछे कोई भी न आये, तो भी तू आगे चलता चला जा।” रवीन्द्रनाथ टैगोर के इस गीत की सार्थकता को दर्शाते हुए, यह पुस्तक विनोबा भावे के जीवन और उनके भूदान यज्ञ आंदोलन की प्रेरणादायक कहानी है। यह कृति उनके उपदेशों और जीवन उद्देश्य को मौजूदा पीढ़ी के लिए प्रेरणा स्रोत सिद्ध करती है, जो आर्थिक और सामाजिक विषमता के समाधान के लिए अहिंसक तरीकों पर बल देती है।
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“तेरी पुकार सुनकर तेरे पीछे कोई भी न आये, तो भी तू आगे चलता चला जा। अंधेरी रात में, बारिश में, तूफानी चक्रवात चल रहा है, सारे दीये बुझ गये हों तो भी तू अपना हृदय-दीप जलाए, आगे बढ़ता चला जा।” कवि रवीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा रचित यह गीत वर्षों पूर्व शायद विनोबा जैसे संतों के लिए ही लिखा गया था। उन्होंने अपना जीवन प्रज्जवलित कर, अकेले ही मानवता की ज्योति को जलाये रखा।
विनोबा सदैव इस बात पर बल दिया करते थे कि दीन-हीन लोगों की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए। ग्रामोद्योग का विकास हो और मुख्य शक्ति ग्राम- सभाओं में निहित हो। हमारी योजनाएँ इस प्रकार की हों कि निर्धन वर्ग को कृषि-ग्रामीण विकास हेतु सीधी आर्थिक सहायता सुलभ हो सके।
तत्कालीन परिप्रेक्ष्य में उनका कहना था कि भारत के सम्मुख दो संकट हैं- एक तो आर्थिक और दूसरा सामाजिक विषमता का संकट। जब तक इन दोनों ही संकटों का अहिंसक तरीकों अथवा रीति- नीति से हल नहीं निकलता, तब तक शांति की स्थापना संभव नहीं है।
प्रस्तुत पुस्तक के माध्यम से कर्मयोगी संत विनोबा भावे के उपदेश एवं उनके द्वारा प्रतिपादित जीवन उद्देश्य मौजूदा पीढ़ी हेतु अवश्य ‘प्रेरणा स्रोत’ सिद्ध होंगे।
| Weight | 300 g |
|---|---|
| Dimensions | 22.5 × 14.5 × 1 cm |
| Genre |












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