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Prachin Bharat Mein Nyayik Pranali

प्राचीन भारत में न्यायिक प्रणाली

Author(s): Dr. Anju Sharma
Language: Hindi
Format: Hardcover
Pages: 184
Publisher: Shyam Prakashan
Edition: Second, 2003
ISBN: 81-87247-29-0

Original price was: ₹250.00.Current price is: ₹225.00.

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प्राचीन भारत की धर्मशास्त्र-सम्मत न्यायिक प्रणाली का सूक्ष्म विश्लेषण। यह पुस्तक राजा, न्यायाधीशों और न्यायिक कार्य में सहयोगियों की भूमिका को गहराई से उजागर करती है, जो शोधार्थियों और इतिहास में रुचि रखने वालों के लिए नए आयाम खोलती है।

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प्राचीन भारतीय समाज की संरचना में धर्म की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी तथा प्राचीनकाल में मनुष्य के लिए ‘धर्म’ तथा ‘व्यवहार’ पर्याय थे। इसलिए पूरी सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था धर्मशास्त्रसम्मत और उसमें अन्तर्निहित नियमों से संचालित थी। इस दृष्टि से प्राचीन भारत की न्याय प्रणाली भी धर्मावलम्बित थी। यद्यपि समस्त न्याय प्रणाली मानवकृत थी तथापि उसके स्रोत धर्मशास्त्र थे। धर्मशास्त्र राजा को दैवीय संस्था मानते थे तथा राजा न्याय प्रणाली का पालक तथा संवाहक था किन्तु वह स्वयं भी न्याय व्यवस्था से ऊपर नहीं था। अतः प्राचीनकाल की न्याय प्रणाली अत्यन्त पवित्र और निर्दोष थी और राजा एवं उसके न्यायाधीशों का विचारवान तथा निष्पक्ष होना नितान्त अनिवार्य था। धर्मशास्त्रसम्मत न्याय-व्यवस्था की रक्षा करना राजा का परम कर्तव्य माना जाता था तथा किसी भी प्रकार की अराजकता का शमन और प्रजां की समस्याओं का विधिसम्मत समाधान उसके प्रबन्ध कौशल का निकष माना जाता था।

प्राचीन भारत की न्याय प्रणाली भले ही धर्मशास्त्र संचालित पवित्र और निर्दोष थी किन्तु वह बहुत सरल और सपाट भी नहीं थी। प्रवेष्य, पुरोहित, ग्रामणी आदि न्यायिक कार्य में ‘प्रधान न्यायाधीश’ (राजा) तथा ‘प्राङविवाक्’ (मुख्य न्यायाधीश) के सहयोगी होते थे। ऊपरी तौर पर लगता था कि यह न्याय की एक सार्वभौम व्यवस्था थी तथा धर्मसूत्रोत्तर अर्थशास्त्र एवं धर्मशास्त्र लौकिक विषयों के संचालन में न्याय व्यवस्था का सहयोग करते थे। लेकिन न्यायपालिका का यह सर्वांगीण संगठन अलौकिक एवं दैविक अवधारणाओं से मुक्त नहीं था। पाप तथा प्रायश्चित का स्वरूप क्रमशः अपराध तथा दण्ड में रूपांतरित हो गया था। अतः सारी न्याय प्रणाली का नियंता ‘धर्म’ ही था।

प्रस्तुत कृति प्राचीन भारत की न्याय प्रणाली की समस्त जटिलताओं का सूक्ष्म विश्लेषण करती है तथा इस विश्लेषण को उपलब्ध तथ्यों से पुष्ट करती है। इस प्रकार यह कृति लेखिका के उस शोध श्रम का परिणाम है, जो उसने प्राचीन ग्रन्थों और शास्त्रों के गहन अध्ययन पर किया है। निश्चय ही यह विश्लेषण शोध के नये आयामों की ओर संकेत करता है।

Weight340 g
Dimensions22.5 × 14.5 × 1.5 cm
Genre

Textbook Genre

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