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Kiraye Ki Kokh Urf Adhura Inkalab

किरये की कोख उर्फ ​​अधूरा इंकलाब

Language: Hindi
Format: Hardcover
Pages: 166
Publisher: Jyoti Prakashan
Edition: First, 2014
ISBN: 978-81-87988-48-9

Original price was: ₹250.00.Current price is: ₹225.00.

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यह उपन्यास “किराए की कोख” के माध्यम से युगीन सत्यों और स्वार्थ-परार्थ के बीच की कशमकश पर करारा व्यंग्य करता है। यह बदलती सामाजिक मानसिकता, नारी शोषण और मानवीय आकांक्षाओं की विडंबनाओं को मार्मिकता से उजागर करता है।

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प्रस्तुत उपन्यास युगीन सत्यों पर एक व्यंग्य है, स्वार्थ और परार्थ के बीच की कशमकश पर करारा व्यंग्य। स्वार्थसिद्धि के लिए मनुष्य ने सैकड़ों बहाने गढ़े हैं, बन्द राहों में से मार्ग निकालने के मनुष्य के विचित्र हथकण्डे; कुण्ठाओं, सौहार्द और लोभाधारित स्वार्थ में समंजन बिठाने तथा चोपड़ा परिवार की महत्त्वाकांक्षाओं को आगे ले जाने के लिए लक्ष्मी के शारीरिक और मानसिक शोषण की यह कथा आद्यंत सामाजिक व्यंग्य बन गई है। फिगर-कांशेसनेस और प्रैगनेंसी फोबिया के कारण ‘किराए की कोख’ का आश्रय लिया जाना ही अपने में बदलती सामाजिक मानसिकता पर व्यंग्य की धार है। स्त्री के बंध्या या बाँझ होने की स्थिति में उसे संतान सुख देने की अवधारणा, ‘सेरोगेसी’, एक इंक्रिलाब बनकर उभरी थी, जिसकी टाँय-टाँय फिस्स उस समय देखने में आई, जब औरतों ने ममत्व की नींव को ही नकारना शुरू कर दिया। लक्ष्मी सरीखी निर्धन पीड़िताओं का शोषण उक्त इंक़िलाब की सहज परिणति है। और फिर पुरुष-प्रधान समाज में धन और लगाव के सुखद प्रस्ताव नारी को ऊँचे शिखरों का लोभ दिखाकर उन्हें ला-परवाही के गर्त में गिराने के बहाने हैं। अपना उल्लू सीधा करने मात्र की दौड़ व्यंग्य के दंश की विषैली सिसकी है। शिल्पी- सचिन, बड़े चोपड़ा दम्पत्ति, सब अपनी जगह खुशियाँ बटोरते हैं और लक्ष्मी बड़ी-बड़ी आशाओं- आकांक्षाओं के बीच नम आँखों से मात्र धाय माँ

की भूमिका में ही जीने को मजबूर होती है- निर्धनता का उपहास, व्यंग्य की प्रश्नाकुलता ! दृश्य खुशियों में कराहती अदृश्य पीड़ा उपन्यास में आद्यंत समाहित है, यही जीवन का मूल व्यंग्य है और इस रचना का कथा-सूत्र भी।

Weight325 g
Dimensions22.5 × 14.5 × 1.5 cm
Genre

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