Kinnar Gatha
किन्नर गाथा
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मनमोहन सहगल द्वारा रचित एक संवेदनशील लघु उपन्यास, जो भारतीय समाज में हाशिए पर धकेले गए किन्नर समुदाय की मूक पीड़ा और अंतर्द्वंद्व को उजागर करता है। यह पुस्तक पारिवारिक अलगाव, सामाजिक उपेक्षा और संस्थागत विमुखता को रेखांकित करते हुए समाज को संवेदनशीलता और समावेशन का संदेश देती है।
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हिन्दी साहित्य में किन्नर समुदाय के सामाजिक जीवन और उनकी वास्तविक मनःव्यथा पर बहुत कम लिखा गया है। लेखक मनमोहन सहगल का यह उपन्यास इसी चुप्पी को तोड़ते हुए एक संवेदनशील पहल करता है।
पुस्तक उन गहरे आघातों को बयां करती है जो एक किन्नर को बचपन में ही अपने परिवार और भाई-बहनों से बिछड़ते समय सहने पड़ते हैं। आजीवन सामाजिक ताने, अलगाव और मानसिक संघर्ष के बीच जीने को मजबूर इस समुदाय की उपेक्षा पर लेखक ने गंभीर सवाल उठाए हैं। जहाँ एक ओर प्रगतिशील समाज और सेवा-संस्थानों का ताना-बाना है, वहीं दूसरी ओर किन्नरों को सम्मानजनक शिक्षा, तकनीकी कौशल और रोजगार के अवसरों से वंचित कर सड़कों पर आश्रित रहने के लिए छोड़ दिया गया।
यह उपन्यास केवल व्यथा की गाथा नहीं, बल्कि एक सामाजिक चेतना का प्रयास है। यह पाठकों, विचारकों और सामाजिक संगठनों को झकझोरता है ताकि किन्नर समुदाय के प्रति वर्षों से जमी उदासीनता की बर्फ पिघले और उनके जीवन में भी समानता, सम्मान व आशा की किरण फैल सके।
| Weight | 300 g |
|---|---|
| Dimensions | 22.5 × 14.5 × 1 cm |



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