Kaal Chakra Khand Kavye
कालचक्र (खण्ड-काव्य)
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Kaal Chakra Khand Kavye प्रभाकर मिश्र ‘सहर’ द्वारा रचित यह खण्ड-काव्य एक प्रलयंकारी युद्ध का सजीव चित्रण करता है, जहाँ भीतर ही देव जग उठते हैं और शिवशंकर अपने भक्त की रक्षा के लिए साकार हो जाते हैं। ‘कालचक्र’ महाकाल के तांडव और बाधाओं के अंत की ओजस्वी गाथा है।
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तब भीतर ही देव जग उठे, युद्ध हुआ प्रलयकर । रक्षा हित निज भक्त, हुए साकार स्वयं शिवशंकर । । होने लगीं घात प्रतिघातें, आयुध महा भयंकर । लगा वक्ष मेरे समक्ष, शिव खड़े हो गए तन कर ।। तत् तत् तत् तत् तोम तोम, तिगदा तिगदा तिट धा धा। करने लगे तांडव शंकर दूर हुई सब बाधा। लपके शंकर लेकर त्रिशूल, अरि-वक्ष उठा तब महा हूल हा हा कर दानव चिल्लाया, जब महाकाल सम्मुख आया ।।
| Weight | 320 g |
|---|---|
| Dimensions | 22.5 × 14.5 × 1.5 cm |
| Genre |




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