Jal Pradushan avam Prabandhan
जल प्रदूषण एवं प्रबन्धन
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Jal Pradushan avam Prabandhan जीवमण्डल में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तत्व जल के प्रदूषण और प्रबंधन पर केंद्रित यह पुस्तक, डॉ. डी. के. ठाकुर द्वारा प्रस्तुत है। यह पुस्तक जल प्रदूषण के कारणों, निवारणों को विस्तार से समझाती है, और शुद्ध पेयजल के महत्व पर बल देती है, जो शरीर की कार्यशीलता में ऊर्जा से भी अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
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जीवमण्डल में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तत्त्व है क्योंकि एक तरफ तो यह सभी प्रकार के जीवों के लिए अत्यधिक महत्त्वपूर्ण तथा आवश्यक तत्त्व है तो दूसरी तरफ यह जीवमण्डल मे पोषक तत्त्वों के संचरण तथा चक्रण में सहायता करता है। इसके अलावा जल बिजली के निर्माण, नौका परिवहन, फसलों की सिंचाई, सीवेज की निपटान आदि के लिए महत्त्वपूर्ण होता है। ज्ञातव्य है कि जलमण्डल के समस्त जल का मात्र एक प्रतिशत ही जल विभिन्न स्रोतों यथा- भूमिगत जल, सरिता-जल, झील- जल, मृदा में स्थित जल, वायुमण्डलीय जल आदि से मानव समुदाय के लिए सुलभ हो पाता है। इनमें से भूमिगत जल सबसे अधिक जल प्रदान करता है। औद्योगीकरण, नगरीकरण तथा मानव जनसंख्या में तीव्र वृद्धि के कारण जल की माँग में गुणोत्तर वृद्धि हुई है, परिणामस्वरूप जल की गुणवत्ता में भारी गिरावट आयी है।
मिट्टी में पैदा होने वाली वनस्पति एवं फसलों तथा उनके आधार पर पलने वाले जीव जन्तुओं से मनुष्य को विभिन्न प्रकार के पोषक तत्त्व (कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, वसा, विटामिन, खनिज) प्राप्त होते हैं। इन्हीं पोषक तत्त्वों के ग्रहण करने से मनुष्य स्वस्थ रहता है, एवं उसमें कार्य करने हेतु आवश्यक ऊर्जा सुलभ होती है। इन विविध पोषक तत्त्वों से युक्त भोजन से भी अधिक अनिवार्य है- शुद्ध पेयजल मनुष्य के शरीर का दो-तिहाई अंश जल से निर्मित है। शरीर की कार्यशीलता में ऊर्जा से अधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका जल की होती है। जल स्वयं पोषक तत्त्व है। इसके अतिरिक्त जल शरीर में अन्य पोषक तत्त्वों को गति प्रदान करता है। रक्त का 80 प्रतिशत जल होने से शरीर में रक्त संचार सम्भव होता है।
प्रस्तुत पुस्तक में जल प्रदूषण के कारणों व निवार्रणों को विस्तार से समझाकर जल प्रबन्धन को भी भली प्रकार से समझाया गया है।
| Weight | 380 g |
|---|---|
| Dimensions | 22.5 × 14.5 × 1.5 cm |







The Sliver Moon
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