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वृद्धावस्था: जीवन की संध्याबेला

Language: हिंदी
Pages: 196
Edition: First, 2009
ISBN: 978-81-88418-32-9

Original price was: ₹300.00.Current price is: ₹270.00.

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वृद्धावस्था जीवन की सांध्य बेला है। यह दिन ढले शाम की तरह है जो धीरे-धीरे रात्रि के गहन अंधकार में तब्दील होता है और अन्ततः मृत्युरूपी रात्रि के सन्नाटे में विलीन हो जाता है। वृद्धावस्था का समापन तो चिरनिद्रा में सोने पर ही होता है।

वृद्धावस्था जीवन का अन्तिम पड़ाव है, आखिरी बेला है। इस पड़ाव में प्रत्येक वृद्ध की हार्दिक इच्छा, उत्कट लालसा एवं असीम अभिलाषा यही होती है कि उसकी वृद्धावस्था सुखपूर्वक कटे। जीवन में आनन्द ही आनन्द हो। उनकी संतान उनका कहना माने। समाज में मान- सम्मान, प्रतिष्ठा व आदर मिले। बीमार पड़ने पर अच्छी चिकित्सकीय सुविधायें प्राप्त हों। वे तीर्थाटन, देशाटन का लाभ उठायें। मगर आज उन्हें हर तरफ से हताशा एवं निराशा ही मिल रही है। आज के बढ़ते भौतिकवाद, भोगवादी संस्कृति, घटते नैतिक मूल्य, नगरीकरण, औद्योगीकरण, एकल परिवार का चलन, संयुक्त परिवार की टूटन आदि ने वृद्धों का जीना दुश्वार कर दिया है। वे अपने ही घर में अनचाहे मेहमान की तरह रह रहे हैं। उनकी ही पढ़ी-लिखी, सुसभ्य व स्वावलम्बी संतान उनकी थरथराती व काँपती अंगुलियों को पकड़कर, लड़खड़ाती टाँगों को, घर से बाहर का रास्ता दिखा देती हैं। उन्हें वृद्धाश्रम में रहने को मजबूर करती हैं। अपनी कड़कती व कर्कश आवाज

से उन्हें प्रताड़ित करती हैं। फलतः बेबस बूढ़ी आँखों में आँसुओं का अम्बार है। हृदय में शान्ति नहीं चीत्कार है। मन शीतल नहीं बेचैन है।

प्रस्तुत पुस्तक वृद्धावस्था की समस्याओं तथा वृद्धों के सामाजिक जीवन में आने वाले शून्य का विवेचन समाजशास्त्र के आलोक में किया गया है।

अतः यह पुस्तक न केवल गृह विज्ञानियों के लिए बल्कि समाजशास्त्रियों, दर्शनशास्त्रियों, नीति निर्धारकों एवं आम जन के लिए भी काफी उपयोगी एवं लाभदायी सिद्ध होगी।

Weight 375 g
Dimensions 22.5 × 14.5 × 1.5 cm
Genre

Textbook Genre

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