डॉ. रजनीश भारद्वाज हिन्दी साहित्य के प्रतिष्ठित शिक्षाविद्, शोधकर्ता, आलोचक एवं संपादक हैं। उनका जन्म 2 अक्टूबर 1962 को हुआ। उन्होंने राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर से हिन्दी विषय में एम.ए. तथा पीएच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त कीं।
वर्ष 1986 से उन्होंने राजस्थान के विभिन्न महाविद्यालयों में अध्यापन कार्य किया तथा हिन्दी भाषा एवं साहित्य के अध्ययन, अध्यापन और शोध के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया। शोध-निर्देशक के रूप में उन्होंने अनेक शोधार्थियों का मार्गदर्शन किया तथा उच्च शिक्षा और अनुसंधान गतिविधियों से सक्रिय रूप से जुड़े रहे। राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर के अनेक सेमिनारों, संगोष्ठियों एवं अकादमिक कार्यक्रमों में उनके शोध-पत्र प्रस्तुत हुए हैं।
डॉ. भारद्वाज की प्रमुख कृतियों में हिन्दी कहानी के आन्दोलन : उपलब्धि और सीमाएँ, देवप्रिय प्रवाण (खण्डकाव्य), घनानन्द कविता (आलोचना), तुलन कहावत कोश, तुलन मुहावरा कोश तथा हिन्दी उपन्यासों में मूल्यबोध विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। हिन्दी साहित्य के विविध पक्षों पर उनका लेखन शोधपरक दृष्टि, आलोचनात्मक विवेक और साहित्यिक संवेदनशीलता का परिचायक है।
संपादन के क्षेत्र में भी उनका योगदान महत्वपूर्ण रहा है। वे कथा कुसुमांजलि, काव्य कलशम् तथा कथा संगम जैसी साहित्यिक कृतियों के संपादन से जुड़े रहे हैं। इसके अतिरिक्त उनके शोधालेख, समीक्षाएँ एवं साहित्यिक लेख विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं।
शिक्षण, शोध, लेखन एवं संपादन के माध्यम से डॉ. रजनीश भारद्वाज ने हिन्दी साहित्य के अध्ययन और विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उनकी कृतियाँ विद्यार्थियों, शोधार्थियों तथा हिन्दी साहित्य के अध्येताओं के लिए उपयोगी संदर्भ सामग्री के रूप में प्रतिष्ठित हैं।
₹70.00Original price was: ₹70.00.₹56.00Current price is: ₹56.00.
यह पुस्तक राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर तथा बृज विश्वविद्यालय, भरतपुर के सेमेस्टर 3 (हिन्दी) के नवीनतम पाठ्यक्रम पर आधारित है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के अनुरूप तैयार की गई यह पुस्तक विद्यार्थियों को सरल भाषा में स्पष्ट, संगठित एवं परीक्षा-केंद्रित अध्ययन सामग्री प्रदान करती है।
₹100.00Original price was: ₹100.00.₹80.00Current price is: ₹80.00.
रीतिकालीन मुक्त काव्य धारा के अग्रणी कवि घनानंद का रीतिकाल के कवियों में विशिष्ट स्थान है, क्योंकि घनानंद के काव्य में हृदय की कोमल भावनाओं और प्रेम की पीर की सहज और मार्मिक अभिव्यक्ति हुई है। उनके कवित्तों को पढ़कर लगता है कि घनानंद ने अपने हृदय की घनीभूत पीड़ा को अपने कवित्तों में उंडेल दिया है। कृष्ण भक्त कवि घनानंद मूलतः प्रेम के कवि हैं और प्रेम में भी विप्रलम्भ की हृदयस्पर्शी व्यंजनाओं के क्षेत्र में वे अप्रतिम हैं। मन की गहराई से निकली घनानंद की कविता में ब्रजभाषा का जो स्वाभाविक और परिष्कृत रूप प्रवाहित हुआ है, वह उन्हें काव्य के क्षेत्र में सबसे अलग पहचान देता है। घनानंद के कवि व्यक्तित्व का निर्माण करने वाले कवित्तों में गहरी वेदना, तीक्ष्ण उपालम्भ तथा प्रेम-विवशताजन्य असहायता के जैसे चित्र उकेरे गये हैं, वे अन्यत्र नहीं मिलते।
प्रस्तुत कृति में लेखक ने आचार्य विश्वनाथ मिश्र द्वारा सम्पादित ‘घनानंद कवित्त’ के प्रथम सौ कवित्तों का भाष्य तथा घनानंद की काव्यगत विशेषताओं का विस्तृत आकलन किया है। यह कृति घनानंद के पाठकों की घनानंद काव्य-विषयक जिज्ञासाओं का सम्यक् समाधान करेगी।
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हिंदी उपन्यासों में मूल्यबोध की प्रक्रिया और उसके अंतरंग विश्लेषण। यह पुस्तक उपन्यास की रचना-प्रक्रिया, जीवन मूल्यों के उद्घाटन और स्थापन को गहराई से समझाती है, जो पाठक को मानव जीवन की भावनात्मकता और दिशा का अहसास कराती है।