

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र (9 सितम्बर 1850 – 6 जनवरी 1885) आधुनिक हिन्दी साहित्य एवं हिन्दी रंगमंच के पितामह तथा भारतीय नवजागरण के अग्रदूत थे। उन्होंने रीतिकाल की दरबारी और श्रृंगारिक प्रवृत्तियों से साहित्य को मुक्त कर जन-चेतना, देशभक्ति और समाज-सुधार से जोड़ा।
उनका जन्म वाराणसी (काशी) के एक प्रतिष्ठित एवं संपन्न वैश्य परिवार में हुआ था। क्वींस कॉलेज, बनारस से प्रारंभिक शिक्षा के बाद उन्होंने स्वाध्याय से संस्कृत, अंग्रेज़ी, बांग्ला, गुजराती, मराठी, मारवाड़ी और उर्दू भाषाओं पर असाधारण अधिकार प्राप्त किया। 1880 में तत्कालीन विद्वत-मंडली ने उनकी युगांतरकारी साहित्यिक सेवाओं के सम्मान में उन्हें ‘भारतेन्दु’ (भारत का इंदु/चंद्रमा) की उपाधि से विभूषित किया। उन्होंने ‘कविवचनसुधा’, ‘हरिश्चन्द्र मैगज़ीन’ और महिलाओं के लिए ‘बालाबोधिनी’ जैसी पत्रिकाओं का सफल संपादन कर आधुनिक गद्य की नींव रखी। मात्र 34 वर्ष की अल्पायु में उनका निधन हो गया, किंतु इतने कम समय में उनके द्वारा किया गया कार्य इतना व्यापक था कि उस पूरे युग को ‘भारतेन्दु युग’ कहा जाता है।
मौलिक नाटक एवं प्रहसन: भारत दुर्दशा, अंधेर नगरी, सत्य हरिश्चन्द्र, वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति, नीलदेवी, चन्द्रावली, प्रेम जोगिनी
अनूदित नाटक: मुद्राराक्षस, विद्यासुन्दर, कर्पूर मंजरी, दुर्लभ बंधु
प्रमुख काव्य कृतियाँ: प्रेम माधुरी, प्रेम तरंग, प्रेम मालिका, फूलों का गुच्छा (खड़ी बोली), रास संग्रह
इतिहास व निबंध: कश्मीर कुसुम, बादशाह दर्पण, नाटक (सैद्धांतिक निबंध)
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