Ghar-Ghar ki Ramleela
घर-घर की रामलीला
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पूरन सरमा का यह व्यंग्य संग्रह समाज में व्याप्त विसंगतियों, विद्रूपताओं और राजनीति की अवसरवादिता पर गहरी चोट करता है। यह रोचक शैली में मानवीय मूल्यों के क्षरण को उजागर करते हुए पाठकों को अपने परिवेश पर सोचने को विवश करता है।
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व्यंग्य की सार्थकता विसंगति पर गहरी चोट से ही निहित है। पूरन सरमा की व्यंग्य रचनाएँ इस ओर से आश्वस्त करती हैं और विश्वास बंधाती हैं कि उनका व्यंग्य फलक और व्यापकता के साथ समाज की विद्रूपताओं को समेटने में सफल होगा। इन्हीं आयामों को लेकर देश के प्रसिद्ध व्यंग्यकारों की निम्न टिप्पणियों को देखा जा सकता है-
पूरन सरमा की व्यंग्य रचनाएँ लम्बे समय से पढ़ रहा हूँ। उनका मैं प्रशंसक भी हूँ। इसके लिए उन्हें हार्दिक बधाई। लेकिन वे गुमनाम व्यंग्यकारों की श्रेणी में आते हैं, क्योंकि वे किसी गुट विशेष में नहीं हैं। उनका शायद कोई व्यंग्य गुरु भी नहीं है। लिखते हैं, यही उनकी गहरी पहचान है।
– डॉ. शिव शर्मा
व्यंग्य क्षेत्र में चल रही धक्कम-मुक्की भले नहीं हो, लेकिन इस भीड़भाड़ में पूरन सरमा की रचनाएँ अलग रखकर देखी जानी चाहिएँ। उनकी व्यंग्य रचनाएँ व्यंग्य लेखन की गंभीर अपेक्षाओं को तो पूरा करती ही हैं, शैली भी रोचकता की पक्षधर हैं। मैं मानती हूँ कि शालीनता और अनुशासन कभी किसी व्यंग्य रचना की प्रहारात्मकता और बोधकता में बाधक नहीं होती। पूरन सरमा की व्यंग्य रचनाएँ इस ओर से भी संतोष देती हैं। उनका व्यंग्य लेखन लाजवाब है।
– डॉ. सूर्यबाला
पूरन सरमा के व्यंग्यों का परिसर अत्यन्त व्यापक है। अकाल, शिक्षा का क्षेत्र, आलोचक, चुनाव, राजनीति, विरह, वसंत, सत्ता, प्रशासन, डॉन, समाजवाद, पुरस्कार की राजनीति क्या नहीं है। ऐसे तमाम विषयों पर उन्होंने न केवल कलम चलाई है, वरन् कलम की नोक गहराई तक चुभती भी है। यही बात उनके व्यंग्यों को सफल और सार्थक बनाती है।
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| Weight | 335 g |
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| Dimensions | 22.5 × 14.5 × 1.5 cm |
| Genre |





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