Baal Manovigyan
बाल मनोविज्ञान
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बालक प्रकृति की, भगवान् की सर्वश्रेष्ठ कृति है, अद्भुत देन है, उपहार है। वे अबोध होते हैं, निश्छल होते हैं, उनका व्यवहार कृत्रिम नहीं होता, वे अपने व्यवहार में बनावटीपन नहीं लाते हैं। बालमन सदैव ही जटिलताओं से परिपूर्ण रहा है। उनका व्यवहार सदैव ही अनबूझा रहा है, पहेली रहा है। कोई नहीं कह सकता, कोई अनुमान नहीं लगा सकता कि किन परिस्थितियों में उनका क्या व्यवहार होगा? बालकों के अनगिनत व्यवहारों का निरीक्षण कर, अवलोकन कर सामान्यीकरण करना असम्भव नहीं कठिन अवश्य है। ऐसी स्थिति में माता-पिता एवं अभिभावकों की बालकों के लालन-पालन को लेकर भूमिका बड़ी महत्त्वपूर्ण बन जाती है। इसी क्षेत्र में माता-पिता, अभिभावकों तथा शिक्षकों की सहायता तथा मार्गदर्शन के लिये प्रस्तुत पुस्तक बाल मनोविज्ञान की रचना की गई है।
सुसमायोजित बालक समाज एवं राष्ट्र की अमूल्य निधि है। वह समाज के स्वीकार्य व्यवहार जाने, प्रयोग में लाये, इसके लिये माता-पिता को प्रारम्भ से ही सावचेत रहना चाहिए। मान लीजिये – एक बच्चा समय पर दूध न मिलने से मचल रहा है, रूठ गया है; जरूरी नहीं कि इन्हीं परिस्थितियों में दूसरे बच्चे का भी यही व्यवहार हो, बड़े भाई-बहिनों को गेंद से खेलते देख छोटा भाई क्रोध कर रहा है, उनके साथ ठीक से व्यवहार नहीं कर रहा है, अपशब्द कह रहा है, पर गेंद न मिलने पर ही अन्य ग्रामीण बच्चा या दीन-हीन माता की सन्तान या सौतेली माता की सन्तान सम्भव है, ऐसा व्यवहार न करे। इससे स्पष्ट है कि छोटे बच्चों के साथ व्यवहार, उनको सम्भालने की विधियाँ सभी स्थितियों में, सभी स्थानों पर एक-सी नहीं हो सकती। माता-पिता जो भी कदम लेंगे, उन स्थितियों में वे प्रयत्न ही सही होंगे क्योंकि माता-पिता ने पिछले अनुभवों से व्यवहार के प्रतिमान सीख लिये हैं। इस दृष्टि से बाल मनोविज्ञान का ज्ञान अनिवार्य हो जाता है।
| Weight | 290 g |
|---|---|
| Dimensions | 22.5 × 14.5 × 1.5 cm |
| Textbook Genre |




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