शील का हिमालय
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Sheel Ka Himalaya ओमप्रकाश शर्मा ‘महामौनी’ का पौराणिक उपन्यास ‘शील का हिमालय’ गुरुकुलों में प्रदान की जाने वाली भारतीय प्राचीन शिक्षा प्रणाली और संयमी, सदाचार के श्रेष्ठ प्रतीक कच के चरित्र से परिचित कराता है। यह कृति शील और संयम के अविचल हिमाचल कच के व्रत की दृढ़ता को दर्शाती है।
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प्रस्तुत उपन्यास ‘शील का हिमालय’ ओमप्रकाश शर्मा ‘महामौनी’ का पौराणिक उपन्यास है। यह उपन्यास पौराणिक संदर्भों से परिचित कराता हुआ गुरुकुलों में प्रदान की जाने वाली भारतीय प्राचीन शिक्षा प्रणाली को भी सामने लाता है। ऐसा ही एक पात्र है कच जो आचार्य बृहस्पति का पुत्र है। वह प्रतिपक्षी आचार्य शुक्र के आश्रम में प्रवेश पा जाता है। वह संयमी एवं सदाचार का श्रेष्ठ प्रतीक है।
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“पूज्यपाद ! नदियाँ, कितनी भी चंचल हों, कितने भी उत्साह से आगे बढ़ रही हों, असंयत और परिवर्तनशील हों, जायेंगी तो निम्नस्तरीय सागर की ओर ही न? वे कभी भी धैर्य के धनी, अविचल हिमालय को अपनी लहरों की चपेट में नहीं ले सकतीं। इसी प्रकार हम सब वटु-कन्यायें, जो इस आश्रम की ब्रह्मचारिणियाँ हैं, एकसाथ अपनी भुजायें पसारकर कच की ओर दौड़ भी पड़ी हों, तो क्या ! कच तो शील और संयम के अविचल हिमाचल हैं, वे भला अपने व्रत से कैसे डिग सकते हैं। आचार्य ! आप कच पर तो विश्वास करते ! कच से विश्वास हटा लेना हिमालय से आस्था हटा लेना है।”
[इसी उपन्यास से]
| Weight | 245 g |
|---|---|
| Dimensions | 22.5 × 14.5 × 1 cm |
| Genre |









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