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हिंदी निबन्ध: उद्भव और विकास

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हिंदी निबंध की जटिल विधा के उद्भव और विकास का सम्यक् रेखांकन। यह पुस्तक निबंध के स्वरूप, भाषिक संयम और रचनात्मक विन्यास की बारीकियों को सरल भाषा में समझाती है, जो विश्वविद्यालयी और प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए उपयोगी है।

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रचनात्मक विन्यास की दृष्टि से कविता के बाद निबन्ध ही सबसे कठिन और सूक्ष्म विधा है। इसीलिए निबन्ध को गद्य की कसौटी कहा गया है। अध्ययन-अध्यापन की दृष्टि से निबन्ध एक जटिल विधा है। इसका कारण यह भी है कि निबन्ध की रचना में निबन्धकार अपने विचारों और भावों को व्यंक्त करने के लिए स्वतन्त्र होता है, किन्तु यह स्वतन्त्रता निबन्धकार की परीक्षा भी होती है, क्योंकि अभिव्यक्ति के स्तर पर निबन्ध विकट भाषा-संयम की मांग करता है। श्रेष्ठ निबन्ध का निकष होता है-कम-से-कम शब्दों में अधिक-से- अधिक कहने की क्षमता। यह क्षमता भावों के साथ भाषा को साधने के बिना सम्भव नहीं है। अतः निबन्ध को पढ़ना और समझना भी श्रमसाध्य कार्य है।

हिन्दी साहित्य में निबन्ध का विकास लगभग सौ वर्ष पुराना है, किन्तु विषय वैविध्य, रचनात्मक भंगिमाओं और भाषिक संयम की दृष्टि से इस विधा ने आशातीत प्रगति की है। आज भी सबसे अधिक निबन्ध ही लिखे जा रहे हैं। इसलिए निबन्ध के स्वरूप में परिवर्तन की प्रक्रिया बहुत तीव्र है।’

प्रस्तुत पुस्तक सरल भाषा में इस जटिल विधा की बारीकियों को समझने का प्रयास करती है। साथ ही हिन्दी निबन्ध के विकास का सम्यक् रेखांकन करती है। लेखकद्वय किसी प्रकार की मौलिकता का दावा नहीं करते, पर वे आश्वस्त हैं कि प्रस्तुत कृति विभिन्न विश्वविद्यालयी परीक्षाओं तथा प्रतियोगी परीक्षाओं में बैठने वाले युवकों की निबन्ध विषयक जिज्ञासाओं का शमन करेगी। निबन्ध के बारे में समग्र जानकारियाँ प्रस्तुत कृति में विधिवत् रूप से विश्लेषित की गयी हैं।

Weight 315 g
Dimensions 22.5 × 14.5 × 1.5 cm
Genre

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