दफ्तर में वसंत
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यह व्यंग्य संग्रह जीवन की छोटी-बड़ी सच्चाइयों को जीवंत रूप में सामने लाता है। भाषा के नए तेवर के साथ व्यंग्यकार असंगत मूल्यों को उद्घाटित करता है। रोचकता इन व्यंग्य रचनाओं का प्राण हैं। विसंगतियों और विद्रूपताओं की चिंदी-चिंदी कर रचनाकार जवाबदेह सवाल खड़े करता है और वास्तविकता से रू-ब-रू कराता है। इनमें व्यंग्य की कोई परिधि नहीं है, विषयों की भरमार से समाज की समकालीन बुराइयों को रचनाकार उजागर करता है। भ्रष्टाचार, दोगलापन, झूठ और फरेब के कुचक्र को सामने लाने वाली ये व्यंग्य रचनायें समय की नब्ज को पहचानती हैं और उन पर गहरी चोट भी करती हैं। वक्रोक्ति के बहाने व्यंग्य का फलक व्यापकता के साथ व्यक्ति के बड़बोलेपन और दिखावे का पर्दाफाश करता है।
यह व्यंग्य संग्रह व्यंग्यकार की पैनी गिद्ध दृष्टि का भी परिचय देता है। जीवन के अनेक बदलावों को सूक्ष्मता से पहचान व्यंग्यकार उन तीखे कटाक्ष करता है। व्यंग्य का कथ्य बहुत बड़ा होने से रचनाओं का छोटा कलेवर भी विराट स्वरूप के साथ सामने आता है। ‘दफ्तर में वसंत’ की भाषा सरल और उलझाव से परे हैं, इसलिए ये व्यंग्य रचनाएँ हर उम्र के पाठक को आकृष्ट करती हैं। व्यंग्य की इस उर्वरा भूमि में असीम दिशाओं की सम्पूर्ण असंगतियों को समर्थ अभिव्यक्ति के साथ समेटा गया है। इन रचनाओं में अंतः प्रेरणा का भाव बहुलता से लक्षित है। आज का युग तो वैसे भी अन्तर्विरोधों और विरोधाभासों से सड़-गल गया है, ऐसी स्थिति में व्यंग्य का तीखा नश्तर समाज के हर अंग की शल्य क्रिया कर देता है। यह संग्रह इस दृष्टि से व्यंग्य का सफल वितान तानता है तथा इसका बहुआयामी शिल्प सौष्ठव सुघड़ होने की पैरवी करता है।
| Weight | 395 g |
|---|---|
| Dimensions | 22.5 × 14.5 × 2 cm |








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