भारतीय राजनय
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Bhartiya Rajnyan द्वितीय महायुद्ध के बाद स्वतंत्र हुए राष्ट्रों, विशेषकर भारत, के राजनयिक संबंधों की स्थापना पर केंद्रित यह पुस्तक, डॉ. शेफाली बार्थोनिया द्वारा प्रस्तुत। यह भारतीय राजनय के इतिहास का सिंहावलोकन करती है और शीतयुद्ध की समाप्ति के बाद उभरे मानवाधिकार, निशस्त्रीकरण, और पर्यावरण जैसे नए मुद्दों के संदर्भ में भारतीय विदेश नीति की चुनौतियों को रेखांकित करती है।
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द्वितीय महायुद्ध के पश्चात् एशिया, अफ्रीका व लैटिन अमेरिका के बहुत से राष्ट्र स्वतन्त्र हुए, जिनकी सम्पूर्ण व्यवस्था शोषण के परिणामस्वरूप तहस-नहस हो चुकी थी। इन राष्ट्रों को अपना ढांचा पुनर्गठित व पुनर्निर्मित करना था जो कि अन्य राष्ट्रों के सहयोग के बिना सम्भव नहीं था। अतः स्वतन्त्र राष्ट्रों को व्यापक स्तर पर अपने राजनयिक सम्बन्ध स्थापित करने पड़े। भारत ऐसे नवोदित राष्ट्रों का अगुवा था। हालांकि भारत में एक लम्बे समय तक राजनय उपेक्षित व अछूता रहा। स्वतन्त्र भारत में जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में भारतीय राजनय को पुनर्गठित कर उसे लोकतांत्रिक स्वरूप प्रदान किया गया। बहुत जल्द भारतीय राजनय को विश्व स्तर पर मान्यता मिली। भारत सहित विकासशील देशों के राजनयिक प्रयासों के सम्मुख उस वक्त एकाएक चुनौती उत्पन्न हो गयी जबकि 1999 के पश्चात् विश्व में साम्यवादी खेमें का विघटन हुआ। शीतयुद्ध की समाप्ति के साथ विचारधाराओं ने अपना अर्थ खो दिया, जिसके फलस्वरूप राज्यों के आचरण को समझने के पुराने मानदण्ड भी समाप्त हो गये।
शीतयुद्ध के दौरान अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में छाए रहने वाले मुद्दे जैसे उपनिवेशवाद, साम्राज्यवाद, सैद्धान्तिक संघर्ष, गुटनिरपेक्षता आदि महत्त्वहीन हो गये हैं और मानवाधिकार, निशस्त्रीकरण, सुशासन, पर्यावरण, मुक्त व्यापार जैसे मुद्दे उभरने लगे हैं। आज शीतयुद्ध के अन्त, बढ़ते भूमण्डलीकरण तथा पर-राष्ट्र चुनौतियाँ, अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों का महत्त्वपूर्ण लक्षण बन गये हैं। ऐसे माहौल में भारतीय विदेश नीति को तेजी से बदलते राजनैतिक परिदृश्य के साथ तालमेल बिठाना एक बड़ी चुनौती है।
यह पुस्तक भारतीय राजनय के इतिहास का सिंहावलोकन तो प्रस्तुत करती ही है, साथ ही शीतयुद्धोत्तर भारतीय राजनय के बदले स्वरूप एवं चुनौतियों को भी रेखांकित करती है।
| Weight | 260 g |
|---|---|
| Dimensions | 22.5 × 14.5 × 1.5 cm |
| Genre | |
| Textbook Genre |







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