भारत में मानव अधिकार
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सत्ता और अधिकारों का संघर्ष उतना ही प्राचीन है जितनी मानवीय सभ्यता। यह संघर्ष तब और प्रखर हो गया जब मनुष्य ने व्यवस्थित जीवन और समाज की नींव रखी। एक सामाजिक प्राणी के रूप में मानवीय विकास के लिए यह आवश्यक था कि जहाँ एक ओर वह अपने अधिकारों की मांग करे वहीं दूसरी ओर वह अन्य मनुष्यों के उन्हीं अधिकारों का सम्मान भी करे।
इक्कीसवीं सदी के प्रारम्भ में यह बहस और भी रोचक हो गयी है क्योंकि अब जहाँ एक ओर मानव समाज में भी विशेष वंचित समूहों के अधिकारों पर जोर दिया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर सभी प्राणियों के विकास अधिकारों को भी प्राथमिकता दी जा रही है- जिनमें स्वच्छ वायु, हरितवन और पीने योग्य पानी को भी अधिकारों की श्रेणी में रखा जा रहा है।
प्रस्तुत पुस्तक में मानव अधिकारों से सम्बन्धित ऐसे ही कुछ पहलुओं को लेखक समूह ने उजागर करने का प्रयास किया है। समूह की विशेषता यह है कि इसके सदस्य विभिन्न आयु वर्ग, क्षेत्र और अनुभव के हैं। सम्पूर्ण रचना को चार भागों में व्यवस्थित किया गया है। भाग एक में मानवाधिकारों से सम्बन्धित वैचारिक पक्ष का उल्लेख है तो भाग दो में जेण्डर बहस को महत्त्वपूर्ण मानते हुए महिलाओं के अधिकारों का विशेष वर्णन है, भाग तीन में उन प्रश्नों को स्थान दिया है जिनकी प्रासंगिकता गत कुछ वर्षों में सिद्ध हो गई है जबकि अन्तिम भाग में संक्षेप में मानव अधिकारों से सम्बन्धित संस्थात्मक बिन्दुओं की चर्चा की गई है।
| Weight | 400 g |
|---|---|
| Dimensions | 22.5 × 14.5 × 2 cm |




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