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बाल विकास

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सृष्टि की अनमोल कृति, भारत का भविष्य, ईश्वर का अनुपम वरदान तथा माता-पिता के प्राण हैं ‘बालक’। ये ही राष्ट्र व विश्व की शान हैं। इन्हीं के सबल कंधों पर भारत का भविष्य टिका है। बालक ही पल-बढ़कर देश का कर्णधार बनता है तथा शासन की बागडोर संभालता है। देश को प्रगति के पथ पर ले जाता है तथा विकास का परचम सम्पूर्ण विश्व में लहराता है। वह अपने महान आविष्कारों, साहसिक कारनामों, अद्भुत कला- कृतियों व तेजस्वी बुद्धिमत्ता से सम्पूर्ण संसार को लाभान्वित करता है तथा देश का मान बढ़ाता है। उसमें गूढ़ रहस्यों को समझने एवं जटिल समस्याओं को सुलझाने की अद्भुत क्षमता एवं विलक्षण गुण होता है।

मगर ऐसा तभी सम्भव है जब बालक शिक्षित, योग्य, कुशल, कर्मठ, मेहनतकश एवं लगनशील होगा। इसके लिए शैशवावस्था से ही बालकों के लालन-पालन, शिक्षा-दीक्षा, आचरण-व्यवहार पर ध्यान देना होगा। उन्हें पग-पग पर संभालना जरूरी है अन्यथा दुष्प्रवृत्तियों के अंधड़ के थपेड़ों को वे नन्हें बालक सह नहीं पाएँगे और असमय ही काल के ग्रास बन जाएँगे। यदि वे जीवित भी बचेंगे तो रोगी, कामचोर, आलसी, सुस्त, चरित्रहीन होंगे जो न तो अपना भला कर पाएँगे और न ही देश का। ऐसे बालकों से समाज सुधार व विकास की अपेक्षा नहीं की जा सकती, अपितु वे तो परिवार, समाज व राष्ट्र के लिए कलंक होंगे। इसलिए बालकों के सर्वांगीण व्यक्तित्व विकास के लिए बाल विकास का अध्ययन किया जाना जरूरी है।

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डॉ. बृन्दा सिंह

डॉ. बृन्दा सिंह ने बी.एससी. (रसायन विज्ञान ऑनर्स) की उपाधि राँची विश्वविद्यालय से प्राप्त की। इसके पश्चात् इन्होंने बी.एससी. गृह विज्ञान की उपाधि राजेन्द्र कृषि विश्वविद्यालय से अर्जित की। इन्होंने एम.एससी. गृह विज्ञान की उपाधि आगरा विश्वविद्यालय से प्रथम श्रेणी…

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