सरल योग साधना
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प्रायः यह माना जाता है कि ईसा से 2 शताब्दी पूर्व पतंजलि ने सर्वप्रथम योगसूत्र की रचना की तथा योग को ‘योगश्चित्तवृत्ति निरोधः’ रूप में परिभाषित किया। एक ओर जहाँ योग का सम्बन्ध मोक्ष या मुक्ति प्राप्ति से है, वहीं इसका सम्बन्ध शरीर विकास और कायाकल्प से भी है। अब तक पश्चिमी संसार ने भी यह स्वीकार कर लिया है कि योग शरीर साधना अथवा स्वास्थ्य साधना का एक वैज्ञानिक मार्ग है। पश्चिम में योग पर विपुल साहित्य प्रकाशित हुआ है जो योग के महत्त्व को प्रतिपादित करता है।
यह तथ्य भी प्रमाणित हो चुका है कि योग साधना शरीर को स्वस्थ तो रखती है तथा मनुष्य को असाध्य रोगों से मुक्ति भी दिलाती है। योग साधना का मूल श्वसन क्रिया को नियंत्रित करना है जिसे प्राणायाम कहते हैं। प्राणायाम योग का एक अंग है। प्राणायाम की तरह ही आसन भी योग का महत्त्वपूर्ण अंग है जो मानव शरीर को स्वस्थ और निरोग बनाता है।
किन्तु योग साधना एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है जिसके लिए योग के अंगों-उपांगों तथा योग क्रियाओं को विधिवत् समझना आवश्यक है। हमारे प्राचीन ग्रन्थों में योग साधना की क्रियाओं की विशद् व्याख्या मिलती है। प्रस्तुत पुस्तक जटिल योग साधना के विभिन्न अंगों और क्रियाओं का सरल भाषा में विवेचन करती है, जिसे पढ़कर व्यक्ति योग साधना को सहजता से अपना सकता है। यह पुस्तक उन व्यक्तियों के लिए वरदान सिद्ध होगी जो अपने व्यस्त जीवन में योग क्रियाओं के लिए कुछ समय निकालकर स्वस्थ जीवन जीने के आकांक्षी हैं। पुस्तक में विभिन्न शारीरिक आसनों की विधियों, उनके प्रभावों एवं शरीर- रचना से उनके सम्बन्धों की व्यावहारिक व्याख्या की गयी है।
| Weight | 235 g |
|---|---|
| Dimensions | 21.5 × 14.5 × 1.5 cm |


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