साहित्य और जीवन के सवाल
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Sahitya aur Jeevan ke Saval गाँधी जी के कारण भारत में पुनर्जागरण की जो बयार चली उससे असहमतियों के बीच सहमतियों की संस्कृति का विकास भी हो रहा था। हेतु भारद्वाज की यह पुस्तक साहित्य और जीवन के सवालों पर केंद्रित है, जो राजनीति में अमर्यादित भाषा के प्रयोग और सामाजिक उन्नयन की चिंता को उजागर करती है। यह कृति बताती है कि राजनेताओं को अपने पद की गरिमा और सामाजिक उत्तरदायित्व की परवाह क्यों करनी चाहिए।
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गाँधी जी के कारण भारत में पुनजागरण की जो बयार चली उससे असहमतियों के बीच सहमतियों की संस्कृति का विकास भी हो रहा था।
गाँधी और सुभाष के बीच असहमतियाँ जगजाहिर थीं, पर क्या कभी सुभाष ने गाँधी की अवमानना की? नेहरू के सबसे कटु आलोचक लोहिया थे, पर क्या कभी उन्होंने नेहरू जी के लिए घटिया भाषा का प्रयोग किया? अटलबिहारी वाजपेयी ने इन्दिरा गाँधी को दुर्गा कहा था क्योंकि उनके मन में इंदिरा गाँधी की बंगलादेश विषयक उपलब्धियों के प्रति सम्मान का भाव था। देश की गरिमा के प्रति आदर था और उनका मन, सारी राजनीतिक प्रतिबद्धता के बावजूद, छोटा नहीं था। राजनीति में यह कैसी संस्कृति विकसित हो रही है कि हम अमर्यादित भाषा के सबसे नीचे पायदान पर खड़े हैं और इसी में सबका साथ सबका विकास साकार होता हुआ देख रहे हैं। यहाँ किसी को न अपने पद की गरिमा की परवाह है न सामाजिक उन्नयन की। ऐसा प्रतीत होता है कि हमारे राजनेताओं के पास गरिमापूर्ण शब्दावली का सर्वथा अभाव है। राहुल गाँधी को सुनकर कई बार लगता है कि वे नरेन्द्र मोदी के सबसे बड़े प्रचारक हैं, इस क्षेत्र में उनकी बराबरी केवल अरविन्द केजरीवाल कर सकते हैं। राजनेताओं की परस्पर आलोचना कोई अनहोनी बात नहीं है, पर सारी बहस व्यक्तिगत आरोपों पर आकर ठहर जाए, यह चिन्ता का विषय है।
| Weight | 425 g |
|---|---|
| Dimensions | 22.5 × 14.5 × 2 cm |















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