Raja Rammohan Roy Evam Maharshi Dayanand Sarasvati : Vyaktitva Aur Kratitva
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उन्नीसवीं शताब्दी में भारत के पुनर्जागरण आन्दोलन में जिन महानुभावों का अप्रतिम योगदान रहा, उनमें राजा राममोहन राय तथा दयानन्द सरस्वती का योगदान अग्रणी है, क्योंकि इन दोनों ही महापुरुषों ने रूढ़ियों, अन्ध-विश्वासों, कुरीतियों, जड़-परम्पराओं के पंक में डूबे भारतीय समाज को जागरण का नया मंत्र दिया। राजा राममोहन राय पूर्णकालिक समाज-सुधारक थे तथा उन्होंने भारत में स्त्रियों की विपन्न दशा से मुक्ति दिलाने का साहसिक कार्य किया। जबकि दयानन्द सरस्ती ने प्रकाण्ड विद्वान् के रूप में अपनी ही संस्कृति की जड़ताओं और सीमाओं पर प्रहार कर भारतीय समाज को जगाने का कार्य किया। इन दोनों महापुरुषों ने माना कि बिना उपयुक्त शिक्षा के प्रचार-प्रसार के भारत में पुनर्जागरण सम्भव नहीं है और यदि सांस्कृतिक दृष्टि से पिछड़े और जड़ समाज को आजादी मिल भी जाती है तो वह उसकी रक्षा नहीं कर पाएगा।
दोनों महापुरुष एक ओर अपने समाज की विद्रूपताओं से लड़े, तो दूसरी ओर विदेशी सत्ता के आतंक से। दोनों जानते थे कि ब्रिटिश सरकार हमारे पिछड़ेपन का लाभ उठाकर हमारी संस्कृति को मिटाने का प्रयास कर रही है। इसलिए राजा राममोहन राय ने भारतीय संस्कृति के मूलाधारों को स्पष्ट कर जागरण का कार्य किया, तो महर्षि दयानन्द से वेदों का भाष्य कर भारतीय संस्कृति की शक्ति का परिचय भारतीयों को दिया। यह एक साहसिक कार्य था कि दयानन्द ने ‘सत्यार्थ प्रकाश’ में कुरान, बाइबिल जैसे धर्मग्रन्थों की सीमाओं का तल्ख खुलासा किया।
प्रस्तुत अध्ययन अपने क्रिया-कलापों से एक पूरे युग को आन्दोलित और आलोकित करने वाले राजा राममोहन राय तथा दयानन्द सरस्वती के कृतित्व का तुलनात्मक अध्ययन निरपेक्ष दृष्टि से विश्लेषित करता है। यह ग्रन्थ भारतीय पुनर्जागरण की प्रवृत्तियों और विडम्बनाओं को समझने का सर्वथा नयी दृष्टि से प्रयास करता है। भारतीय पुनर्जागरण आन्दोलन में रुचि रखने वाले अध्येताओं के लिए यह एक अपरिहार्य ग्रन्थ है।
| Weight | 460 g |
|---|---|
| Dimensions | 22.5 × 14.5 × 2 cm |



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