प्राचीन भारत का इतिहास (78-650)
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कुषाणोत्तर भारतीय इतिहास में गुप्त सम्राज्य का काल केन्द्रीय आकर्षण का युग है। प्रायः भारतीय इतिहास में गुप्तकाल को राजनीतिक और सांस्कृतिक उपलब्धियों की दृष्टि से ‘स्वर्ण काल’ और ‘क्लासिकल काल’ आदि नामों से अभिहीत किया जाता है। गुप्त युग के साम्राज्य को चरमोत्कर्ष पर ले जाने के लिए समुद्रगुप्त और चन्द्रगुप्त द्वितीय जैसे सम्राटों को श्रेय दिया जाना चाहिए। लेकिन विशाल साम्राज्य के स्थापन से कोई युग ‘विशिष्ट’ नहीं बनता है। उस युग की सर्वोन्मुखी चेतना का साहित्य कला और विज्ञान में प्रस्फुटन उस सांस्कृतिक प्रभा का निर्माण करता है जिससे उस युग को स्वर्णयुग की संज्ञा प्राप्त होती है। हूणों के आक्रमण के पूर्व गुप्तकाल में निरन्तर पूर्ववर्ती परम्पराएँ शास्त्रीय रूप प्राप्त करती हैं। क्लासिकल युग की अवधारणा भी स्वर्ण काल से बहुत भिन्न नहीं है। किसी देश का क्लासिकल युग वह युग होता है जब देश के इतिहास में वे सांस्कृतिक मानदण्ड स्थिर होते हैं जो परवर्ती युग के लिए अनुकरणीय बन जाते हैं। गुप्त युग निश्चय ही हिन्दू प्रतिभा की सृजनात्मक गतिविधियों के पल्लवन का काल था। इस आदर्श को प्राप्त करने के लिए प्रारम्भिक गुप्त सम्राटों ने साम्राज्य को शक्तिशाली, दृढ़, गत्यात्मक और सुखी बनाया। वसुबन्धु, नायन्मारो के मीमांसात्मक विचार, कालिदास के श्रेष्ठ काव्य और नाटक, वराहमिहिर के खगोलशास्त्रीय आविष्कार, दिल्ली का लौह स्तम्भ, अभूतपूर्व मन्दिरों का निर्माण, अजन्ता के भित्ति चित्र, वैष्णव और शैव सम्प्रदायों का उदय, ‘महाभारत’ की पूर्णता, वायु और मत्स्य पुराणों की रचना इसी युग की घटनाएँ हैं। परम्परागत जीवन पद्धति में भव्यता का प्रतिबिम्ब इस युग की निजी विशिष्टता है। ये सब तत्त्व सम्मिलित रूप से स्वर्णयुग को स्वरूप प्रदान करते हैं इसे उन्मुक्त भाव से स्वीकार किया जाना चाहिए। परवर्ती गुप्तकाल तथा हर्ष के युग में किस प्रकार गुप्त आदर्शों का ह्रास होता है वह उस युग के इतिहास से स्पष्ट है।
| Weight | 620 g |
|---|---|
| Dimensions | 22.5 × 14.5 × 3 cm |










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