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Maharana Sangram Singh

Language: हिंदी
Pages: 295
Published Year: 2009
ISBN: 978-81-7056-490-4

Original price was: ₹400.00.Current price is: ₹320.00.

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राणा सांगा के नाम से प्रसिद्ध औ। अपने शौर्य और पराक्रम के कारण मिथक बन गये महाराणा संग्राम सिंह भारतीय इतिहास में एक कीर्तिपुरुष के रूप में ख्यात हैं। महाराणा संग्रामसिंह ने अपने अदम्य ‘साहस और दुर्दमनीय पराक्रम से मेवाड़ के बप्पारावल की वंश परम्परा को अक्षुण्ण रखा। उनकी जीवट और जिजीविषा का ही परिणाम था कि रणक्षेत्र में अस्सी घावों को सहन करते हुए महाराणा संग्रामसिंह का क्षत-विक्षत शरीर सांगोपांग लड़ रहा था। खानवा के मैदान में संग्रामसिंह को विदेशी आक्रान्ता बाबर की सैन्य- शक्ति के विरुद्ध अपनी प्रतिष्ठा, सम्प्रभुता और अस्मिता को बचाने के लिए उन्हें दुर्धष संघर्ष करना पड़ा था। देश के राजाओं ने राणा सांगा की कोई मदद नहीं की थी।
महाराणा संग्रामसिंह का व्यक्तित्व शौर्य और पराक्रम के साथ उदारता, कृतज्ञता, पूर्वजों के प्रति सम्मान तथा स्वजनों के प्रति स्नेहभाव से आपूरित था। श्याम सुन्दर भट्ट का यह उपन्यास जहाँ महाराणा सांगा के क्रिया-कलापों का सम्यक् चित्रण करता है वहीं तत्कालीन भारतीय राजनीतिक परिदृश्य को पाठकों के समक्ष साकार कर देता है। लेखक ने बड़ी कुशलता से महाराणा संग्रामसिंह के जीवन संघर्ष को उदात्तता प्रदान की है, उसके साथ भारतीय इतिहास के कुछ जलते पन्नों को भी पलटकर तत्कालीन संदर्भ में इतिहास प्रवाह को देखा है।
इस कृति की सबसे बड़ी ताकत इसकी पठनीयता है। कथानक की घटनाओं को इस कौशल से पिरोया गया है कि पाठक कृति को बिना पढ़े नहीं छोड़ सकता। लेखक की भाषा-भंगिमा ने इस कृति को और सम्प्रेषणीय बना दिया है। ऐतिहासिक उपन्यासों तथा अपने देश के पराक्रम और शौर्य पुरुषों के चरित्रों में रुचि रखने वाले सुधीजनों के लिए यह उपन्यास निश्चय ही एक अपरिहार्य कृति रहेगी।

Weight 490 g
Dimensions 22.5 × 14.5 × 2.5 cm

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