जयपुर ताबीज
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जब आपका शहर “स्मार्ट” हो जाता है… लेकिन आपकी ज़िंदगी नहीं बदलती तो क्या होता है?
जयपुर ताबीज़ एक संघर्षरत युवा की उलझनों, पीड़ा और हास्य को सजीव रूप में प्रस्तुत करता है, जो सपनों और हकीकत के बीच फँसा हुआ है। यह आज की तेज़ी से बदलती दुनिया में खुद को रुका हुआ महसूस करने वाले हर व्यक्ति की बेहद जुड़ी हुई कहानी है।
अगर यह कहानी आपकी लगी… तो इसे पढ़े बिना रह पाना मुश्किल होगा।
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क्या “स्मार्ट सिटी” सच में जीवन को बेहतर बनाती है, या यह सिर्फ दिखावे का नया चेहरा है?
“जयपुर ताबीज़” अजय अनुरागी द्वारा रचित एक तीखा और प्रभावशाली व्यंग्य उपन्यास है, जो आधुनिक शहरों की चकाचौंध के पीछे छिपी सच्चाई को उजागर करता है। यह केवल जयपुर की कहानी नहीं, बल्कि हर उस शहर की कहानी है जो “स्मार्ट” बनने की दौड़ में अपनी पहचान खोता जा रहा है।
उपन्यास का नायक एक निम्न-मध्यवर्गीय युवा है, जो सपनों और संघर्षों के बीच जूझता रहता है। बेरोज़गारी, सामाजिक दबाव, पारिवारिक अपेक्षाएँ और बदलते समय की विडंबनाएँ उसके जीवन को एक जीवंत और व्यंग्यात्मक दर्पण में बदल देती हैं।
लेखक ने सहज, रोचक और कटाक्षपूर्ण शैली में दिखाया है कि कैसे विकास के नाम पर शहर बदलते हैं, लेकिन इंसान भीतर से खाली होता जाता है। परंपराएँ कमजोर हो रही हैं, रिश्ते खोखले होते जा रहे हैं और जीवन की सरलता कहीं पीछे छूटती जा रही है।
यह उपन्यास आपको हँसाएगा भी और भीतर तक झकझोर देगा — एक ऐसी कथा जो आज के समाज का सटीक आईना प्रस्तुत करती है।
✦ मुख्य विशेषताएँ:
- तीखा और प्रभावशाली व्यंग्यात्मक लेखन
- “स्मार्ट सिटी” और परंपराओं के टकराव का यथार्थ चित्रण
- निम्न-मध्यवर्गीय युवा के संघर्षों की सच्ची झलक
- हास्य के साथ गहरी सामाजिक टिप्पणी
- सरल, प्रवाहमय और एक बैठक में पढ़ने योग्य शैली
- समकालीन भारतीय समाज का सटीक प्रतिबिंब
| Weight | 220 g |
|---|---|
| Dimensions | 22 × 14 × 1 cm |
1 review for Jaipur Tabeez
समीक्षाएँ
अरविंद तिवारी
“जयपुर ताबीज़” महानगर बने शहर की विद्रूपताओं, बेरोज़गारी, सामाजिक विडंबनाओं और बदलते संबंधों को तीखे व्यंग्य के साथ प्रस्तुत करता है। उपन्यास के पंच वाक्य और व्यंग्यात्मक भाषा इसे अत्यंत पठनीय बनाते हैं।
पूरा पढ़ें
“जयपुर ताबीज़” कवि व्यंग्यकार अजय अनुरागी का नया व्यंग्य उपन्यास है जो पंचशील प्रकाशन जयपुर से 2026 में आया है।इससे पहले उनका उपन्यास जयपुर तमाशा चर्चा में रहा था।जयपुर तमाशा की थीम पर अन्य लेखकों ने भी उपन्यास लिखे।जयपुर तमाशा प्रकाशित होने में काफ़ी वक्त लगा और तब तक, जिसे इसने पढ़ा,इस थीम पर लिखने लगा।अजय अनुरागी का नया उपन्यास “जयपुर ताबीज़” जयपुर तमाशा का एक तरह से एक्सटेंशन है।दोनों उपन्यासों की शैली में ज्यादा फर्क नहीं है। वही थीम,उसी तरह का बेरोजगार नायक जिसे न नौकरी मिल रही है और न विवाह हो रहा है।इस उपन्यास में महानगर बने शहर की विद्रूपताएं हैं।तमाम तरह की कथाएं और उपकथाएं उपन्यास का ताना बाना बुनती हैं।महानगर में तब्दील हो चुके शहर में अब हलवाई की दुकानें और पान की दुकानें खोजने पर भी नहीं मिलतीं।संबंध स्मार्ट हो गए हैं।पानी जैसी वस्तु को सेवा से बाहर कर दिया गया है।
तमाम तरह के पात्र इस उपन्यास के कथानक को आगे बढ़ाते हैं।नायक मुरली तो है ही जो उपन्यास खत्म होते होते जयपुर ताबीज़ की बदौलत विवाह के बंधन में बंध जाता है।जयपुर अड्डे पर तमाम बेरोजगार मिल जाते हैं।देवर भाभी चौराहा बहुत महत्वपूर्ण है जहां असली देवर भाभी तो आते ही हैं, उधार के देवर भाभी भी देखे जा सकते हैं।बी ए पास गुप्त रोग विशेषज्ञ रामशरण का धंधा जयपुर अड्डे के कारण फलता फूलता है।दूसरे राज्य से विवाह करवाने वाले दलाल तो हैं ही, उपन्यास में पिल्ला गुरु,बिच्छू दादा, गिरगिट गुरु,अघोर वैभव जैसे विशिष्ट पात्र भी हैं।फर्जी मार्कशीट बनाने वाले से लेकर सियासी पार्टी के लिए कार्यकर्ता भर्ती करने वाले भी हैं जो बेरोजगारी मिटा रहे हैं।नगर निगम की सियासत से लेकर विश्वविद्यालय की सियासत आदि सब कुछ है।कमल सिंह और सुरेंद्र सिंह की दोस्ती है।कमल सिंह औलाद पाने के लिए छटपटाता है तो सुरेंद्र सिंह का प्रयास औलाद नहीं होने देने का है।उपन्यास में झोट वन भी है जिसमें से गुजर रही रेल लाइन आत्म हत्या का कारण बनती है।बढ़ती आत्महत्याओं के कारण सरकार ने पंचनामा आदि के लिए वहां एक पुलिस चौकी भी स्थापित कर रखी है।
अजीब स्थिति यह है कि महानगर में पारंपरिक मिठाईयां नहीं मिलतीं पर लोग अभी भी छतों पर सोते हैं।एक दूसरे की छतों पर ताका झांकी भी करते हैं।
उपन्यास में जगह जगह आए पंच वाक्य उपन्यास को पठनीय बनाने का काम करते हैं।कुछ पंच वाक्य देखें__
“उसकी नज़र में निष्ठा और विष्ठा का भेद मिट गया था।”
“चिड़ियों ने शहर को बचा रखा था।शहर ने बिल्लियों को बचा रखा था।”
“भ्रष्टाचार तैरता रहा।प्रशासन तैरता रहा।सरकार तैरती रही।”
“एक दिन शहर के सिर पर सींग और पुट्ठे पर पूंछ उग आई”
“शहर में गुरुओं की संख्या बढ़ने से लगता था देश फिर से विश्व गुरु बन जाएगा।”
“मधुमक्खियां इमली के पेड़ को बचाने के लिए प्राकृतिक स्टे ले आईं थीं।”
“देश कचरे के ढेर पर बैठा हुआ था तो कचरा देश की देह पर लेटा हुआ था।”
“कामरेड उमाशंकर ने पीले वस्त्र धारण कर लिए थे।”
“इधर राजनीति ऊपर की मंजिल छोड़कर निचले स्तर पर उतर आई थी।इस कारण शहर का निचला स्तर भारी हो गया था।”
उपन्यास की भाषा कथानक के सर्वथा अनुकूल है।कई जगह व्यंजना से भाषा विशिष्ट हो गई है।
अजय अनुरागी मेरे पुराने मित्र हैं।वह तबसे व्यंग्य लिख रहे हैं जब हम चंद लोग ही राजस्थान में व्यंग्य लेखन के लिए जाने जाते थे।एक सजग पाठक,व्यंग्यकार और उपन्यासकार होने के नाते यह जरूर कह सकता हूं, यह उपन्यास अच्छा है पर जयपुर तमाशा से उन्नीस है।हो सकता है यह मेरा नज़रिया हो और आप इससे सहमत न हों।
अजय अनुरागी जी को बहुत बधाई और इसका भी शुक्रिया कि उन्होंने एक अच्छा उपन्यास मुझ तक पहुंचाया।
प्रो. सूरज पालीवाल
अजय अनुरागी के पास अपनी विशिष्ट व्यंग्यात्मक भाषा है, जो पूरे कथ्य को व्यंग्य की पिचकारी से भिगो देती है। यह व्यंग्य उपन्यास हमारे आसपास के समाज और समय को असाधारण तेवर में प्रस्तुत करता है।
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“जयपुर तमाशा” के बाद “जयपुर ताबीज़” सुपरिचित व्यंग्यकार अजय अनुरागी का नया उपन्यास है । हिंदी में व्यंग्य विधा उपेक्षित और गरीब की जोरू की तरह है, जो आता है परसाई जी का नाम लेकर बाकी सबको धिक्कारता चला जाता है मानो परसाई जी के बाद हिंदी व्यंग्य में कुछ लिखा ही नहीं गया हो । कवि और कथाकार भाग्यशाली हैं कि वे अपने मोहल्लों, गलियों, कस्बों और शहरों में सहज ही निराला और प्रेमचंद हो जाते हैं । मैंने किसी व्यंग्यकार को परसाई होते नहीं सुना । अच्छा है व्यंग्यकार ऐसा वैसा होने से बच गए, जो बच गए वे परसाई जी से आगे के व्यंग्यकार हैं ।
अजय अनुरागी के पास अपनी भाषा है, जो व्यंग्य में घुलमिल गई है । अधिकतर लेखकों के पास लद्धड़ भाषा होती है, जो व्यंग्य की सुई को मोथरा करती है । अजय अपनी भाषा को मांजते हैं, जो इस उपन्यास के शीर्षकों में देखी जा सकती है जैसे अचानक शहर स्मार्ट हो गया था तथा मनमानी पर उतर आया था । वह स्वयं से असंतुष्ट रहने लगा । उसकी नज़र में निष्ठा और विष्ठा का भेद मिट गया था । तथा गंदगी श्रद्धा में बदल गई । श्रद्धा धन में बदल गई । धन कुकर्म में बदल गया । कुकर्म पूजनीय हो गए । पूजनीय प्रेरणा बन गए । प्रतिभा प्रेरणा बन गई । प्रतिभा के समक्ष सब नताशीश हो गए । तथा आत्मा अमर है । शरीर नश्वर है । आत्मा के भरोसे शरीर की हत्या कर देना मूर्खता है । जिनके पास आत्म थी वे शरीर बेचने लगे थे । जिनके पास शरीर था वे आत्मा की बोली लगा देते थे । शहर में शरीर और आत्मा दोनों मरते चले जा रहे थे ।
यह भाषा का नमूना है जो व्यंग्यमय है । कहना न होगा कि व्यंग्य भाषा की व्यंग्यात्मकता से निकलता है और पूरे कथ्य को व्यंग्य की पिचकारी से भिगो देता है । बेरोज़गारी इस गरीब देश के लिए बड़ी समस्या है, जिस देश में अस्सी करोड़ से अधिक लोग हर माह मिलने वाले अन्न पर जीवित हों, बेरोज़गारी दर आसमान छू रही हो, वह देश विश्वगुरु और शहर स्मार्ट हो जाएं या होने का भ्रम पाल ले तो उस पर व्यंग्य की भाषा में ही लिखा जा सकता है । व्यंग्य हमें केवल हंसाता ही नहीं है बल्कि अंदर से उमेठता भी है । अजय अनुरागी का यह व्यंग्य उपन्यास जिस तेवर और जिस भाषा में हमारे आसपास को दिखाता है, वह असाधारण है ।
बधाई अजय अनुरागी जी और स्वागत जयपुर ताबीज़ ।
अक्षत मिडोज, सिरसी रोड, हाथोज मोड, जयपुर,राजस्थान















भारत की सांस्कृतिक विरासत और आर्थिक संरचनाएँ
समीक्षा –
व्यंग का बहुत रोचक उपन्यास है।