हिन्दी नाटक : उद्भव और विकास
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Hindi Natak: Udbhav Aur Vikas हिन्दी नाटक और रंगमंच के उद्भव, विकास और अद्भुत प्रयोगों का वस्तुनिष्ठ आकलन। यह कृति नाट्यशास्त्र के सिद्धांतों और भारत में नाटक की दैवी उत्पत्ति से लेकर आधुनिक प्रगति तक की विस्तृत यात्रा का विश्लेषण करती है और पाठकों के समक्ष नाटक और रंगमंच का समूचा परिदृश्य प्रस्तुत करती है।
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नाटक को आचार्यों ने एक सम्पूर्ण विधा रूप में प्रतिष्ठा प्रदान की है। इसलिए विश्व विभिन्न भाषाओं का काव्यशास्त्र नाटक का केंद्र रखकर ही तैयार किया गया। भरत का ‘ नाट्यशा और अरस्तू का विरेचन सिद्धान्त इसके प्रमाण है। भारत में तो नाटक की उत्पत्ति को दैवी विधान से जोड़कर देखा गया है। इसमें संदेह नहीं कि नाटक साहित्य की ऐसी विधा है जिसका आस्वादन हर श्रेणी का और हर मानसिक स्थिति का मनुष्य कर सकता है। इसका कारण यह है कि नाटक का आस्वादन दर्शक/पाठक अपने स्व को तिरोहित करते हुए करता है। साधारणीकरण का सिद्धान्त इसी स्थिति की ओर संकेत करता है।
हिन्दी में नाटक और रंगमंच का विकास बड़ी तेजी से हुआ तथा नाटक के क्षेत्र में अद्भुत प्रयोग भी हुए। भारत की प्रादेशिक भाषाओं में नाटक और रंगमंच का निरन्तर विकास हुआ, इसीलिए दिल्ली में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की स्थापना के साथ ही प्रदेशों में भी सरकारों के सहयोग से रंगमंच स्थापित हुए। नाटककारों और रंगकर्मियों के व्यक्तिगत प्रयासों से भी नाटक और रंगमंच निरन्तर विकासमान होता रहा। एक ओर लोक नाट्य, नुक्कड़ नाटक, मुक्त मंच जैसे रूप विकसित हुए तो दूसरी ओरे वैज्ञानिक प्रगति के साथ रेडियो, दूरदर्शन तथा सिनेमा ने इस विधा को नये-नये रूप प्रदान किये। इतना ही नहीं ये नवीनतम साधन नाटक और रंगमंच के समक्ष चुनौती बन उपस्थित हो गये। किन्तु न नाटक की प्रगति रूकी न रंगमंच की। इस तरह हिन्दी नाटक और रंगमंच ने जो लम्बी यात्रा की है उसका वस्तुनिष्ठ आकलन प्रस्तुत करने का प्रयास यह कृति करती है। जहाँ यह कृति नाटक और रंगमंच की विकास यात्रा का विश्लेषण करती है वहीं नाटक की रचना के सूत्रों को समझने का प्रयास भी करती है। यह कृति नाटक और रंगमंच का समूचा परिदृश्य पाठ के समक्ष प्रस्तुत करती है
| Weight | 425 g |
|---|---|
| Dimensions | 22.5 × 14.5 × 1.5 cm |
| Genre |















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