भू-राजस्व एवं भू-अभिलेख प्रशासन
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भू-राजस्व प्रशासन के सैद्धांतिक, व्यावहारिक और तुलनात्मक पहलुओं का विस्तृत अध्ययन। यह पुस्तक भू-अभिलेखों, भू-राजस्व नियमों और कानूनों को गहराई से समझाती है, जो भूमि प्रशासन की बारीकियों को समझने के लिए एक प्रामाणिक स्रोत है।
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भारत एक कृषि प्रधान देश है। सारे औद्योगीकरण के बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था आज भी कृषि पर आधारित है। प्राचीनकाल से ही कृषि को आजीविका का सर्वोत्तम साधन माना गया है, किन्तु इस क्षेत्र की सबसे बड़ी विडम्बना यह रही है कि भूमि पर अधिकार जमींदार अथवा सामंतों का रहा और कृषि कर्म करने वाला वर्ग श्रम के आधार पर ही जीवन-यापन करता रहा। भू-अभिलेख तैयार करने की परम्परा अंग्रेजों के काल में आरम्भ हो गयी थी। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भूमि-सुधार आन्दोलन हुए तथा भू-स्वामित्व भी बदला। जमीन जोतने वाला व्यक्ति ही जमीन का मालिक बन गया। भूमि सुधार प्रक्रिया में भू राजस्व में नये-नये नियम बने। यह कार्य इतना व्यापक और विशाल था कि भू-प्रशासन के नाम से एक स्वतंत्र विभाग की आवश्यकता पड़ी।
भू प्रशासन का स्वरूप इतना विशद् और व्यापक है कि ग्राम स्तर से लेकर राज्य स्तर तक इसकी परिधि है। देश के सभी प्रदेशों में भू राजस्व के नियम तथा ढांचागत व्यवस्थाएँ अलग-अलग हैं। लेकिन छोटे से गाँव के एक किसान की भूमि के अभिलेख से लेकर पूरे प्रदेश की भूमि के अभिलेखों का लेखा-जोखा भूमि राजस्व प्रशासन के अन्तर्गत ही होता है। यही प्रशासन समय-समय पर होने वाले भूमि सुधार नियमों की अनुपालना को सुनिश्चित करता है। तात्पर्य यह है कि भूमि राजस्व प्रशासन एक महत्त्वपूर्ण तथा जन-जीवन से जुड़ा अनुशासन है, जिसकी जानकारी सभी के लिए जरूरी है।
डॉ. गिरवर सिंह राठौड़ ने भूमि प्रशासन श्रृंखला के अन्तर्गत पाँच ग्रन्थों का प्रणयन किया है। इसी श्रृंखला की कृति ‘भू-राजस्व एवं भू- अभिलेख प्रशासन’ में विद्वान लेखक ने भू-राजस्व प्रशासन से सम्बन्धित सभी पक्षों का सैद्धान्तिक, व्यावहारिक और तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया है। इस कृति से पाठक भू-राजस्व प्रशासन की सभी बारीकियों को स्पष्टता के साथ समझ सकता है।
| Weight | 380 g |
|---|---|
| Dimensions | 22.5 × 14.5 × 1.5 cm |
| Textbook Genre |









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