भर्तृहरि की अमर रचना
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Bhartrihari ki Amar Rachna नीति, वैराग्य और श्रृंगार-शतकों के प्रणेता महाराजा भर्तृहरि की अमर रचनाओं का डॉ. पी.डी. शर्मा द्वारा अंग्रेजी में सरस अनुवाद। यह कृति भर्तृहरि के व्यापक अनुभव संसार और उनकी वाणी के मुख्य भाव वैराग्य को दर्शाती है, जो तीनों शतकों में व्यक्त भावशवलता, अभिव्यक्ति की भास्वरता और भाषा की सहजता के कारण विश्व की अनेक भाषाओं में अनूदित हुए हैं।
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नीति, वैराग्य और श्रृंगार-शतकों के प्रणेता महाराजा भर्तृहरि ही सिद्ध भर्तृहरि थे। वे एक वैयाकरण भी थे। उनके पदों में गोरखनाथ का गुरु के रूप में स्पष्ट उल्लेख मिलता है। कुछ लोग भर्तृहरि का समय छठी शताब्दी मानते हैं तो कुछ विद्वान इनका समय 13वीं शताब्दी बताते हैं। ऐसा लगता है कि छठी शताब्दी के महाराज भर्तृहरि से सम्बद्ध लोककथाओं तथा लोकगीतों में वर्णित उनका चमत्कारपूर्ण व्यक्तित्व परस्पर घुल-मिल गया, जिससे दोनों के व्यक्तित्व को अलग करना असम्भव हो गया।
भर्तृहरि की वाणी का मुख्य भाव वैराग्य है तथापि उन्होंने श्रृंगार और नीति के श्लोकों की भी रचना की। इसका कारण यह है कि उनका अनुभव संसार बहुत व्यापक था, जिसका परिचय शतक त्रय के श्लोकों में मिल जाता है। इन शतकों की लोकप्रियता की वजह से उनका वैयाकरण रूप उभर नहीं पाया, पर यह सच है कि उत्तरआधुनिकता के स्रोत पाश्चात्य विद्वान भी भर्तृहरि के ‘वाक्पदीयम’ में खोजते हैं।
भर्तृहरि के तीनों शतक भावशवलता, अभिव्यक्ति की भास्वरता तथा भाषा की सहजता के कारण विश्व की अनेक भाषाओं में अनूदित हुए हैं। इस कृति में डॉ. पी.डी. शर्मा ने, जो स्वयं एक कवि हैं, भर्तृहरि के तीनों शतकों के श्लोकों का अंग्रेजी भाषा में सरस अनुवाद किया है। इस अनुवाद में पाठक को मूल कृति का सा आनन्द आएगा ऐसा हमारा विश्वास है।
| Weight | 300 g |
|---|---|
| Dimensions | 22.5 × 14.5 × 1.5 cm |
| Genre |



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