पंडित कामताप्रसाद गुरु (1875 – 16 नवम्बर 1947) हिन्दी के मूर्धन्य वैयाकरण, भाषाविद्, साहित्यकार एवं संपादक थे। उन्हें आधुनिक खड़ी बोली हिन्दी के व्याकरण को सर्वप्रथम व्यवस्थित, वैज्ञानिक और प्रामाणिक रूप प्रदान करने का श्रेय प्राप्त है। इसी युगांतरकारी योगदान के कारण उन्हें साहित्य जगत में ‘हिन्दी का पाणिनी’ कहा जाता है।
उनका जन्म मध्य प्रदेश के सागर ज़िले में हुआ था। वे बहुभाषाविद् थे और उन्होंने हिन्दी, संस्कृत, ब्रजभाषा तथा मराठी में गहन अध्ययन किया। नागरी प्रचारिणी सभा, काशी के अनुरोध पर उन्होंने 1920 में अपने ऐतिहासिक ग्रंथ ‘हिंदी व्याकरण’ की रचना की, जो आज भी हिन्दी भाषा का सबसे प्रामाणिक एवं मानक ग्रंथ माना जाता है। उन्होंने प्रतिष्ठित पत्रिकाओं ‘सरस्वती’ और ‘बालसखा’ का संपादन भी किया तथा उपन्यास, काव्य और नाटकों की रचना की।
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युगांतरकारी व्याकरण ग्रंथ: हिंदी व्याकरण (नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित मानक ग्रंथ), संक्षिप्त हिंदी व्याकरण, मध्य हिंदी व्याकरण, प्रथम हिंदी व्याकरण
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अन्य प्रमुख कृतियाँ:
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काव्य: भौमासुर वध, विनय पचासा, पद्य पुष्पावली
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उपन्यास: सत्य, प्रेम, पार्वती, यशोदा
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नाटक व अन्य: सुदर्शन (पौराणिक नाटक), हिंदुस्तानी शिष्टाचार
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