Gijubhai Badheka

गिजुभाई बधेका (15 नवम्बर 1885 – 23 जून 1939), जिनका पूरा नाम गिरिजाशंकर भगवानजी बधेका था, भारत में बाल-केन्द्रित शिक्षा और मोंटेसरी पद्धति के प्रवर्तक एवं प्रसिद्ध लेखक थे। बच्चों के प्रति अगाध प्रेम और उनकी संवेदनाओं को समझने के कारण उन्हें आदरपूर्वक ‘मूंछों वाली माँ’ कहा जाता है।

उनका जन्म गुजरात के चित्तल (सौराष्ट्र) में हुआ था। वकालत छोड़कर उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन प्राथमिक और बाल-शिक्षा के सुधार में समर्पित कर दिया। वर्ष 1920 में उन्होंने भावनगर में ‘दक्षिणामूर्ति बाल मंदिर’ की स्थापना की और भयमुक्त, रोचक व खेल-कूद आधारित शिक्षण विधियों के सफल प्रयोग किए। उन्होंने बच्चों की कल्पनाशक्ति, भाषा और चरित्र-निर्माण के लिए 200 से अधिक बालोपयोगी पुस्तकें, प्रेरक कहानियाँ, नाटक और गीत लिखे। उनकी कालजयी पुस्तक ‘दिवास्वप्न’ शिक्षक-प्रशिक्षण और बाल-मनोविज्ञान का उत्कृष्ट मार्गदर्शक मानी जाती है।

  • प्रमुख शिक्षा-विमर्श ग्रंथ: दिवास्वप्न (Daydreams), माँ-बाप से, शिक्षक हो तो, चलते-फिरते शिक्षा, मेरी पाठशाला

  • बाल-साहित्य एवं कथा-माला: बाल महिमा, बालकथा माला (सैकड़ों कहानियों व लोककथाओं का संग्रह), चाँद-सूरज के फूल, मुनिया रानी

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