प्रो. धर्मचन्द जैन भारतीय राजनीति विज्ञान, संवैधानिक अध्ययन और नैतिक चिंतन के क्षेत्र में एक प्रतिष्ठित हस्ताक्षर हैं। बोराणा (भीलवाड़ा) के मूल निवासी प्रो. जैन छात्र जीवन से ही विलक्षण प्रतिभा के धनी रहे; उन्होंने माध्यमिक स्तर से लेकर राजनीति विज्ञान में एम.ए. तक की सभी परीक्षाएँ प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कीं और विश्वविद्यालय स्तर पर सर्वोच्च (प्रथम) स्थान प्राप्त किया। राजस्थान के विभिन्न राजकीय महाविद्यालयों में अपनी दीर्घ अकादमिक सेवाएँ देने के उपरांत, वे मार्च 2011 में से.मु.मा. राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भीलवाड़ा से प्राचार्य पद से सेवानिवृत्त हुए।
अकादमिक एवं वैचारिक योगदान
प्रमुख विषय: भारतीय संविधान, शासन-प्रणाली, राजनीतिक व्यवस्था तथा समकालीन राजनीति की उभरती प्रवृत्तियों पर अनेक प्रमाणिक पुस्तकों का प्रणयन, जो शोधार्थियों एवं सामान्य पाठकों दोनों में समान रूप से लोकप्रिय हैं।
शोध एवं विमर्श: राष्ट्रीय शोध-पत्रिकाओं एवं प्रमुख समाचार-पत्रों में दर्जनों शोध-आलेख व समसामयिक टिप्पणियाँ प्रकाशित।
नैतिक दर्शन से जुड़ाव: विगत पाँच दशकों से आचार्यश्री तुलसी, आचार्यश्री महाप्रज्ञ तथा आचार्यश्री महाश्रमण के मानवीय व नैतिक आंदोलनों से निरंतर सक्रिय जुड़ाव।
प्रतिष्ठित पुरस्कार एवं अलंकरण
डॉ. भीमराव अम्बेडकर स्मृति प्रथम पुरस्कार: मध्य प्रदेश विधानसभा सचिवालय द्वारा उनकी कालजयी कृति ‘राज्यपाल’ के लिए प्रदत्त।
विशिष्ट विद्वान सम्मान: अंतर्राष्ट्रीय रामस्नेही सम्प्रदाय द्वारा सर्वोच्च विद्वत सम्मान।
अणुव्रत सम्मान श्रृंखला: नैतिक मूल्यों के प्रसार हेतु अणुव्रत महासमिति, दिल्ली द्वारा ‘महाप्रज्ञ प्रतिभा पुरस्कार’, ‘अणुव्रत सेवी अलंकरण’ एवं वर्ष 2018 का ‘अणुव्रत लेखक पुरस्कार’।
बोधि पुरस्कार: वर्ष 2019 में विशिष्ट साहित्यिक योगदान हेतु सम्मानित।
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प्रस्तुत पुस्तक में प्रधानमंत्री राजीव गाँधी के शासन काल में राज्य-राजनीति के निर्धारक तत्त्वों, राष्ट्रीय राजनीति के परिप्रेक्ष्य में राज्य-राजनीति के उभरते स्वरूप, राज्य- राजनीति की दिशा तथा दशा तथा इसकी उभरती प्रवृत्तियों का समीक्षात्मक विश्लेषण किया गया है।
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1980 ई. के लोकसभा के मध्यावधि चुनाव में श्रीमती इन्दिरा गाँधी के नेतृत्व में कांग्रेस (इं) को दो-तिहाई बहुमत प्राप्त हुआ। प्रस्तुत पुस्तक में इसके बाद से लेकर 1984 ई. की अवधि अर्थात् श्रीमती इन्दिरा गाँधी के प्रधानमंत्रित्व काल के द्वितीय चरण तक की अवधि में, राज्यों की राजनीति के विविध पहलुओं पर वर्णनात्मक, व्याख्यात्मक तथा विश्लेषणात्मक प्रकाश डाला गया है। श्रीमती इन्दिरा गाँधी की हत्या के साथ राष्ट्रीय तथा राज्य राजनीति के एक युग का अवसान हो गया।
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प्रस्तुत पुस्तक में जनता पार्टी के अभ्युदय, उसकी राज्यवाद स्थिति, जनता पार्टी की विजय तथा केन्द्र में सत्ता-परिवर्तन, राज्यों में मतदाताओं का मतदान- व्यवहार, जनता पार्टी सरकार द्वारा, राष्ट्रपति शासन की अधिसूचना के माध्यम से कांग्रेस शासित राज्य सरकारों की बर्खास्तगी, राज्य विधानसभाओं के चुनाव, राज्यों में केन्द्र समर्थित राज्य सरकारों को अविर्भाव, राज्यों में जनता पार्टी में सत्ता-संघर्ष तथा मुख्यमंत्रियों को विश्वास मत प्राप्त करने का निर्देश, जनता पार्टी के मुख्यमंत्रियों की कार्य-शैली, केन्द्र में जनता पार्टी सरकार का पतन, जनता (एस) सरकार का सत्ता में आना, विश्वास मत की शर्त, चरणसिंह सरकार का पतन, राष्ट्रपति द्वारा लोकसभा को भंग कर के मध्यावधि चुनाव कराने का निर्णय तथा मध्यावधि चुनाव में कांग्रेस (इं) की सत्ता में वापसी इत्यादि पहलुओं का सांगोपांग विश्लेषण किया जा रहा है।
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प्रस्तुत पुस्तक में 1971 ई. के लोकसभा के मध्यावधि चुनाव से लेकर 1977 ई. लोकसभा चुनाव परिणामों तक राज्य-राजनीति का जो स्वरूप उभरा, उसका वर्णनात्मक, व्याख्यात्मक और विश्लेषणात्मक विवेचन किया गया है।
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1967 ई. के चतुर्थ आमचुनाव का भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में अपूर्व महत्त्व है। इसने राज्यों में कांग्रेस के एकाधिकार को समाप्त किया। अनेक राज्यों में गैरकांग्रेसी सरकारें सत्ता में आई। लेकिन ये सरकारें अस्थिरता का पर्याय बन गई। 1967 से 1972 ई. के राज्य विधानसभा के चुनाव के पूर्व अवधि तक दलबदल, मध्यावधि चुनाव, राज्यपालों की विवादास्पद भूमिका, राज्यों में राष्ट्रपति शासन, राज्यों की उथल-पुथल की राजनीति की प्रवृत्तियों के रूप में उभरी। इन सब प्रवृत्तियों का वर्णनात्मक, व्याख्यात्मक तथा विश्लेषणात्मक वर्णन किया गया है।
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स्वतंत्रता के बाद में, भारत में नवीन संविधान लागू किया गया। इसके बाद, देश में लोकतान्त्रिक शासन व्यवस्था को अपनाया गया है। इसके तहत् देश में स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी निर्वाचन व्यवस्था को अपनाया गया। प्रस्तुत पुस्तक में प्रथम आमचुनाव से लेकर चतुर्थ आमचुनाव के पूर्व तक की राज्य-राजनीति की दिशा और दशा का वर्णनात्मक, व्याख्यात्मक तथा विश्लेषणात्मक अध्ययन किया गया है।
₹500.00Original price was: ₹500.00.₹450.00Current price is: ₹450.00.
भारतीय लोकसभाओं के विघटन और उससे उत्पन्न संवैधानिक प्रश्नों का तुलनात्मक विश्लेषण। यह पुस्तक स्वतंत्रता के बाद से अब तक की लोकसभाओं के परिदृश्य को उजागर करती है, भारतीय राजनीति में स्वस्थ परंपराओं के विकास के लिए महत्वपूर्ण सुझाव देती है।
₹500.00Original price was: ₹500.00.₹400.00Current price is: ₹400.00.
ग्यारहवीं, बारहवीं और तेरहवीं लोकसभाओं की राजनीतिक घटनाक्रम, प्रधानमंत्रियों की कार्यशैली और गठबंधन सरकारों के पतन का विस्तृत विश्लेषण। यह पुस्तक भारतीय राजनीति की दिशा, दलीय संरचना और लोकसभा विघटन के संवैधानिक पहलुओं पर गहन चर्चा करती है।
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Political Science Short Description: भारत की चतुर्थ, छठी और नौवीं लोकसभाओं की राजनीतिक पृष्ठभूमि, प्रधानमंत्रियों के आचरण और दलीय विघटन का विश्लेषणात्मक अध्ययन। यह पुस्तक राजनीतिक अस्थायित्व, दलबदल और लोकसभा विघटन के कारणों पर गहराई से प्रकाश डालती है।