पाश्चात्य काव्यशास्त्र : परम्परा और सिद्धान्त
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पाश्चात्य काव्यशास्त्र : परम्परा और सिद्धान्त पाश्चात्य साहित्यिक चिंतन की परम्परा और प्रमुख सिद्धान्तों का सरल एवं सुव्यवस्थित परिचय प्रस्तुत करती है। प्लेटो से लेकर आधुनिक आलोचकों तक के विचारों को ऐतिहासिक क्रम में समझाते हुए यह पुस्तक काव्य, कला और साहित्य की विभिन्न धाराओं को स्पष्ट करती है। विद्यार्थियों, शोधार्थियों एवं प्रतियोगी परीक्षार्थियों के लिए यह एक उपयोगी और विश्वसनीय मार्गदर्शिका है।
पाश्चात्य साहित्यिक चिंतन की समृद्ध परम्परा और उसके विकासक्रम का एक व्यापक एवं सुव्यवस्थित अध्ययन प्रस्तुत करने वाली महत्वपूर्ण कृति है। यह पुस्तक प्राचीन यूनान से प्रारम्भ होकर आधुनिक एवं उत्तर-आधुनिक काल तक काव्य, कला और साहित्य से संबंधित प्रमुख विचारधाराओं एवं सिद्धान्तों का सरल एवं क्रमबद्ध विवेचन करती है।
पुस्तक में प्लेटो, अरस्तू, लोंजाइनस, होरेस, वर्ड्सवर्थ, कॉलरिज, मैथ्यू ऑर्नल्ड, टी.एस. इलियट, आई.ए. रिचर्ड्स, मार्क्स, फ्रायड, क्रोचे, सात्र आदि प्रमुख चिन्तकों के विचारों को उनके ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भों सहित प्रस्तुत किया गया है। साथ ही मार्क्सवाद, मनोविश्लेषणवाद, अस्तित्ववाद, नयी समीक्षा जैसी प्रमुख साहित्यिक धाराओं का भी स्पष्ट एवं सरल विश्लेषण किया गया है।
इस कृति की विशेषता इसकी सरल, सुबोध और अध्यापन-उपयुक्त शैली है, जिसमें जटिल सिद्धान्तों को भी सहज रूप में समझाने का प्रयास किया गया है। लेखक ने विषय को अनावश्यक क्लिष्टता से बचाते हुए विद्यार्थियों की समझ को केन्द्र में रखकर प्रस्तुत किया है।
पुस्तक को दो भागों में विभाजित किया गया है—पहले भाग में पाश्चात्य काव्यशास्त्र की ऐतिहासिक परम्परा का विवेचन है, जबकि दूसरे भाग में प्रमुख सिद्धान्तकारों के विचार, जीवन-परिचय एवं उनके साहित्यिक योगदान का विश्लेषण किया गया है।
यह पुस्तक विशेष रूप से स्नातक, स्नातकोत्तर विद्यार्थियों, शोधार्थियों, अध्यापकों तथा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले अभ्यर्थियों के लिए अत्यंत उपयोगी है। हिन्दी माध्यम में पाश्चात्य काव्यशास्त्र को समझने के लिए यह एक विश्वसनीय और आवश्यक संदर्भ ग्रंथ है।
| Weight | 165 g |
|---|---|
| Dimensions | 22.5 × 14.5 × 1.5 cm |



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