कविता का स्वभाव
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डॉ. रमाकान्त शर्मा इधर के उन समीक्षकों में से प्रमुख हैं जिन्होंने आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और डॉ. रामविलास शर्मा की आलोचना को सहज समकालीनता के मिजाज से विकसित किया है। । प्रस्तुत पुस्तक महत्त्वपूर्ण इसलिए है कि यहाँ कविता के नये प्रतिमानों से गहरी असहमति जता कर कुछ ऐसे प्रतिमानों तथा काव्य सिद्धान्तों का विनम्र प्रस्ताव किया गया है जिन्हें हम किसी भी समय की कविता को परखने के लिए काम में ला सकते हैं। समग्र कृति कविता, कवि कर्म तथा इनसे जुड़े उन सभी सवालों को बड़ी उत्कटता से उठाती है जिन्हें हर बड़ा कवि और समीक्षक उठाने को प्रेरित होते हैं।
‘कविता का स्वाभाव’ समीक्षा कृति आज के सन्दर्भ में कविता, कवि कर्म तथा उनके सामाजिक महत्त्व या उनसे जुड़े अन्य सरोकारों को विस्तृत फलक पर समझने का बड़ा सार्थक प्रयत्न है। ऐसे प्रश्न या तो उठाए ही नहीं जाते या उठाकर अभिजात वर्ग के दायरे में उन्हें उलझा दिया जाता है। समीक्षक की विश्वदृष्टि साफ है। उसकी भाषा बड़ी रचनात्मक है। वह स्वयं एक कवि हैं। यह समीक्षा कृति कहीं से न तो यांत्रिक है और न उबाऊ । आज की बहुत-सी कविता के बारे में कहा जाता है कि जैसे वह एक ही कुनवा के लोगों द्वारा लिखी जा रही है-अतः चेहराविहीन है। ठीक वही हाल आज की अधिकांश काव्य समीक्षा का है। पर डॉ. रमाकान्त शर्मा की यह समीक्षा कृति आज की काव्य समीक्षा के चलताऊ और कामचलाऊ मुहावरे को छोड़ नितान्त भिन्न और निजी मुहावरा रचती है।
सन्देह नहीं यह कृति आज के सन्दर्भ में कविता और कवि से जुड़े सभी सवालों को उठाकर उनके बेवाक निष्कर्ष देती है। इसे पढ़कर कोई भी पाठक कविता के प्रति आकर्षित होगा। कवि कर्म के गहन दायित्व को समझेगा। कृति के अन्त तक आते-आते हमें लगने लगता है कि आज के मुक्तबाजार और उपभोक्तावादी समाज में कविता कितनी जरूरी है। वह इस विनाशकारी दुनिया में हमारे जीवन को बेहतर बनाने के लिए पहली शर्त भी है।
| Weight | 250 g |
|---|---|
| Dimensions | 22 × 15 × 1.5 cm |

