अनुवाद : प्रक्रिया और तकनीक
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Anuvad: Prakriya Aur Takneek अनुवाद की प्राचीन परंपरा और वर्तमान युग में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका पर केंद्रित, डॉ. रामप्रकाश कुलश्रेष्ठ की यह कृति अनुवाद को एक स्वतंत्र विधा के रूप में स्थापित करती है। यह पुस्तक अनुवाद प्रक्रिया के विभिन्न रूपों, स्रोत-भाषा की गहराई में जाने की जटिलता और अनुवादकों की दक्षता वृद्धि के लिए एक समग्र मार्गदर्शिका है।
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अनुवाद की परम्परा अत्यन्त प्राचीन है। हमारे देश में मूल ग्रन्थों की टीकाएँ लिखने की शुरुआत इसलिए की गयी कि सामान्यजन ग्रन्थ के पाठ को समझ सकें। किन्तु टीकाकार का कार्य विषयवस्तु को खोलकर समझाने के साथ उसके विषय में अपनी सम्मति भी प्रकट करना था। किन्तु अनुवादक का कार्य टीकाकार से भिन्न तथा अधिक दायित्वपूर्ण है क्योंकि अनुवादक टीकाकार जितनी स्वतन्त्रता नहीं ले सकता। विभिन्न ज्ञानानुशासनों के विकास ने अनुवाद की भूमिका को गम्भीर बनाया है तथा अनुवाद एक स्वतन्त्र विधा के रूप में आज स्थापित हो चुकी है।
भूमण्डलीकरण और विश्व बाजारवाद के इस युग में अनुवाद हमारी बड़ी जरूरत बन चुका है। अब विभिन्न देशों तथा ज्ञानानुशासनों के बीच संवाद स्थापित करने का सबसे सशक्त माध्यम अनुवाद ही है। इसलिए अनुवाद वर्तमान समय में एक स्वतन्त्र विधा का स्वरूप ग्रन्थ कर चुका है। लेकिन अनुवाद कर्म बहुत तकनीकी और श्रमसाध्य कार्य है। अनुवाद वस्तुतः पुनसृजन ही है इसलिए अनुवाद में दक्षता प्राप्ति के लिए दो भाषाओं का ज्ञान तो जरूरी है ही, उन भाषाओं की प्रकृति को समझना भी जरूरी है। अनुवाद की प्रक्रिया एक जटिल प्रक्रिया है और अनुवादक को स्रोत-भाषा की सामग्री की गहराई में जाना पड़ता है जो परकाया प्रवेश की तरह होता है।
प्रस्तुत कृति स्वतन्त्र विधा के रूप में अनुवाद के महत्त्व को प्रतिपादित करने के साथ अनुवाद प्रक्रिया के विभिन्न रूपों का उत्खनन करती है। अनुवादकों तथा अनुवाद सीखने वालों की दक्षता में वृद्धि के लिए यह पुस्तक अपरिहार्य पुस्तक है क्योंकि अनुवाद पर यह एक समग्र कृति है।
| Weight | 380 g |
|---|---|
| Dimensions | 22 × 14.5 × 2 cm |
| Genre |















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