हमारे बारे में

1968 से अकादमिक उत्कृष्टता की परंपरा

पंचशील प्रकाशन पिछले पाँच दशकों से भारतीय अकादमिक प्रकाशन जगत में एक विश्वसनीय नाम रहा है—जो शैक्षिक अध्ययन को दिशा देता आया है, शिक्षकों का सहयोग करता रहा है और हिंदी-माध्यम के विद्यार्थियों की पीढ़ियों को सशक्त बनाता रहा है।

हमारी कहानी

19 फरवरी 1968 को जयपुर में स्थापित, पंचशील प्रकाशन की शुरुआत एक सरल किंतु सशक्त विश्वास के साथ हुई— गुणवत्तापूर्ण शिक्षा हर विद्यार्थी तक उसकी अपनी भाषा में पहुँचनी चाहिए।

जो कार्य एक छोटे प्रकाशन प्रयास के रूप में प्रारम्भ हुआ, वह धीरे-धीरे शिक्षकों एवं विश्वविद्यालयों के साथ निकट सहयोग के माध्यम से एक राष्ट्रीय स्तर के प्रतिष्ठित अकादमिक प्रकाशन संस्थान के रूप में विकसित हुआ।

आज पंचशील की पुस्तकें विश्वविद्यालयी परीक्षाओं, प्रतिस्पर्धात्मक अध्ययन तथा आजीवन बौद्धिक विकास में विद्यार्थियों का मार्गदर्शन कर रही हैं।

1968

स्थापना वर्ष

1,000+

प्रकाशित पुस्तकें

50+ वर्ष

प्रकाशन अनुभव

लाखों

पाठक

About Us – Panchsheel Prakashan

हमारे संस्थापक

श्री मूलचंद गुप्ता (1936–2021)

दूरदर्शी प्रकाशक एवं शिक्षा-विद् श्री मूलचंद गुप्ता ने अपना संपूर्ण जीवन हिंदी विद्वत्ता और अकादमिक प्रकाशन को सुदृढ़ बनाने में समर्पित किया।

13 सितंबर 1936 को राजस्थान के सीकर जनपद स्थित जोरावर नगर ग्राम में जन्मे श्री गुप्ता में प्रारम्भ से ही सामाजिक, सांस्कृतिक एवं शैक्षिक सेवा-भाव विकसित हुआ।

अपने इस सेवा-संकल्प को साकार करने हेतु उन्होंने 19 फरवरी 1968 को पंचशील प्रकाशन की स्थापना की। इस संस्था के माध्यम से उन्होंने संदर्भ, सामान्य तथा विश्वविद्यालय-स्तरीय अकादमिक ग्रंथों का व्यापक प्रकाशन किया, जिससे पंचशील प्रकाशन आगे चलकर पाठ्य-पुस्तक प्रकाशन के क्षेत्र में एक विश्वसनीय नाम के रूप में स्थापित हुआ।

ईमानदारी, अनुशासन और लेखकीय गरिमा के प्रति उनकी प्रतिबद्धता आज भी पंचशील प्रकाशन के कार्य-संस्कारों का मार्गदर्शन करती है।

सम्मान एवं दायित्व
  • हिंदी प्रकाशन के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान हेतु अखिल भारतीय हिंदी प्रकाशक संघ द्वारा सम्मानित
  • अखिल भारतीय हिंदी प्रकाशक संघ — कोषाध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष (पूर्व)
  • राजस्थान पुस्तक व्यवसायी संघ — महामंत्री (पूर्व)
  • साहित्य सेवा सम्मान — जय साहित्य संसद, जयपुर

हम क्या प्रकाशित करते हैं

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